Delhi

राजेंद्र चोल प्रथम आदि तिरुवथिरई महोत्सव 23 जुलाई से 27 जुलाई तक

मंत्रालय ने बताया कि

इस महोत्सव में कलाक्षेत्र फाउंडेशन एक विशेष भरतनाट्यम समूह गायन प्रस्तुत करेगा, जिसके बाद पारंपरिक ओथुवरों द्वारा देवराम थिरुमुराई का गायन होगा। साहित्य अकादमी द्वारा प्रकाशित देवराम भजनों पर एक पुस्तिका का औपचारिक विमोचन भी किया जाएगा। महोत्सव का समापन महान उस्ताद पद्म विभूषण इलैयाराजा और उनकी मंडली द्वारा एक संगीतमय प्रस्तुति के साथ होगा, जो चोल युग की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक प्रतिभा को एक सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

23 जुलाई से शुरू होने वाले इस पांच दिवसीय महोत्सव में हर शाम जीवंत सांस्कृतिक प्रस्तुतियां होंगी। आगंतुक कलाक्षेत्र फाउंडेशन के कलाकारों द्वारा भरतनाट्यम प्रस्तुतियां देखेंगे और तंजावुर स्थित दक्षिण क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र के प्रशिक्षित छात्रों द्वारा देवराम थिरुमुराई मंत्रोच्चार का आनंद लेंगे—ये दोनों ही चोल शासन के दौरान फली-फूली गहरी आध्यात्मिक और कलात्मक परंपराओं को दर्शाते हैं।

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) चोल शैव धर्म और मंदिर वास्तुकला पर विशेष प्रदर्शनियों का आयोजन करेगा, इसके अलावा विरासत यात्राएं और निर्देशित दौरे भी आयोजित किए जाएंगे, जो इस अवधि की सांस्कृतिक और स्थापत्य विरासत में दुर्लभ अंतरदृष्टि प्रदान करेगें।

उल्लेखनीय है कि

राजेंद्र चोल प्रथम (1014-1044 सीई) भारतीय इतिहास के सबसे शक्तिशाली और दूरदर्शी शासकों में से एक थे। उनके नेतृत्व में चोल साम्राज्य ने दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया में अपना प्रभाव बढ़ाया। उन्होंने अपने विजयी अभियानों के बाद गंगईकोंडा चोलपुरम को अपनी शाही राजधानी के रूप में स्थापित किया और वहां उनके द्वारा निर्मित मंदिर 250 वर्षों से भी अधिक समय तक शैव भक्ति, मोनुमेंटल वास्तुकला और प्रशासनिक कौशल का प्रतीक रहा। आज, यह मंदिर एक यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल के रूप में खड़ा है, जो अपनी जटिल मूर्तियों, चोल कांस्य और प्राचीन शिलालेखों के लिए प्रसिद्ध है।

आदि तिरुवथिरई महोत्सव समृद्ध तमिल शैव भक्ति परंपरा का भी जश्न मनाता है, जिसें चोलों द्वारा उत्साहपूर्वक समर्थन दिया गया था और 63 नयनमारों- तमिल शैव धर्म के संत-कवियों- द्वारा अमर कर दिया गया था।