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बच्चियों की सुरक्षा, न्‍यायालय और पर्सनल लॉ : जरूरी है समान नागरिकता

भारत के लोकतांत्रिक ढांचे के सामने इस समय सबसे गंभीर सवाल यह है कि क्या देश की बच्चियों और बच्चों की सुरक्षा उनकी धार्मिक पहचान और पर्सनल लॉ से तय होगी या फिर संविधान और संसद द्वारा बनाए गए कानून सभी पर समान रूप से लागू होंगे। यह सवाल केवल कानूनी तकनीक या न्यायिक व्याख्या तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज के भविष्य और राष्ट्र की दिशा तय करने वाला है। हाल के वर्षों में विभिन्न उच्च न्यायालयों ने मुस्लिम पर्सनल लॉ का हवाला देते हुए यह कहा कि यदि कोई मुस्लिम लड़की यौवन प्राप्त कर चुकी है तो उसका विवाह, भले ही वह 18 वर्ष से कम उम्र की हो, वैध माना जाएगा। इन निर्णयों के पीछे तर्क दिया गया कि शरीयत के अनुसार यौवन विवाह की क्षमता प्रदान करता है। परंतु यह व्याख्या बच्चों के अधिकारों, संसद द्वारा बनाए गए पॉक्सो कानून और संविधान के मूलभूत सिद्धांतों को सीधी चुनौती देती है।

संसद ने 2012 में बच्चों को यौन अपराधों से बचाने के लिए पॉक्सो अधिनियम पारित किया। इसमें साफ-साफ परिभाषा दी गई कि 18 वर्ष से कम उम्र का हर व्यक्ति बच्चा है और उसके साथ किसी भी प्रकार का यौन संबंध अपराध है, चाहे वह विवाह के नाम पर ही क्यों न हो। जब अदालतें पर्सनल लॉ के आधार पर इस प्रावधान को दरकिनार करती हैं, तो केवल कानून का उल्लंघन नहीं होता, बल्कि यह एक ऐसी दोहरी व्यवस्था पैदा करता है, जो संविधान की समानता की गारंटी को कमजोर करती है।

संवैधानिक कसौटी और समानता का सवालः संविधान के अनुच्छेद 14 सभी को समानता का अधिकार देते हैं, अनुच्छेद 15(3) महिलाओं और बच्चों को विशेष संरक्षण प्रदान करता है और अनुच्छेद 21 हर नागरिक को गरिमा और जीवन का अधिकार सुनिश्चित करता है। ये अधिकार धर्म या परंपरा पर निर्भर नहीं हैं। जब हिंदू, सिख, ईसाई, बौद्ध या पारसी बच्चियों के लिए विवाह की न्यूनतम आयु 18 वर्ष है, लेकिन मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत इसे 15 या 16 वर्ष में वैध ठहराया जाता है, तो यह नागरिकता की समानता के सिद्धांत पर सीधा आघात है। राष्ट्र तभी “एक कानून, एक सुरक्षा” की दिशा में आगे बढ़ सकता है, जब सभी बच्चियों को उनकी धार्मिक पहचान से परे समान सुरक्षा मिले। अन्यथा भारत दोहरी व्यवस्था वाला देश बन जाता है, जहाँ एक समुदाय की बेटी को राज्य का संरक्षण मिलता है और दूसरी बेटी उसी उम्र में “वैवाहिक बंधन” के नाम पर असुरक्षित छोड़ दी जाती है।

विधिक ढांचा और न्यायालयों की व्याख्याः देश में बाल विवाह निषेध अधिनियम, 2006 और पॉक्सो अधिनियम, 2012 दोनों स्पष्ट रूप से 18 वर्ष की आयु से पहले विवाह और यौन संबंधों को अपराध घोषित करते हैं। इतना ही नहीं, उच्चतम न्यायालय ने 2017 में इंडिपेंडेंट थॉट बनाम यूनियन ऑफ इंडिया के ऐतिहासिक फैसले में कहा कि यदि पत्नी की आयु 18 वर्ष से कम है तो उसके साथ यौन संबंध बलात्कार के समान अपराध होगा। इस फैसले ने परंपरा को बच्चों की सुरक्षा से ऊपर रखने से इनकार किया और संविधान की सर्वोच्चता को स्थापित किया। बावजूद इसके, पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय जैसे कुछ न्यायालयों ने मुस्लिम पर्सनल लॉ का हवाला देकर नाबालिग विवाह को मान्यता दी। वहीं, दिल्ली और केरल उच्च न्यायालय ने साफ कहा कि पॉक्सो सभी व्यक्तिगत कानूनों से ऊपर है। यह विरोधाभास अपने आप में इस आवश्यकता को रेखांकित करता है कि अब सर्वोच्च न्यायालय को संविधान पीठ गठित कर स्पष्ट और सर्वमान्य निर्णय देना चाहिए।

एनसीपीसीआर और न्यायपालिका का रुखः बच्चों के अधिकारों की रक्षा के लिए संसद ने राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर) बनाया। यही संस्था जब सुप्रीम कोर्ट में पहुंची तो उसकी याचिका को यह कहकर खारिज कर दिया गया कि वह “अजनबी” है और मामले में उसकी लोकस स्टैंडी नहीं है। यह स्थिति अत्यंत चिंताजनक है। अगर बच्चों की वैधानिक संरक्षक संस्था को ही न्यायपालिका सुनने को तैयार न हो, तो फिर बच्चियों की आवाज कौन उठाएगा? संसद को चाहिए कि वह एनसीपीसीआर को यह अधिकार स्पष्ट रूप से प्रदान करे कि वह सीधे सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों में बच्चों के अधिकारों से जुड़े मामलों में हस्तक्षेप कर सके।

बाल विवाह आज भी सामाजिक चुनौतीः यह प्रश्न अक्सर मुस्लिम पर्सनल लॉ तक सीमित कर दिया जाता है, लेकिन सचाई यह है कि बाल विवाह पूरे देश में एक व्यापक सामाजिक समस्या है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस-5) के अनुसार भारत में 23 प्रतिशत लड़कियां 18 वर्ष से पहले विवाह कर लेती हैं। ग्रामीण इलाकों में यह दर और अधिक है। पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखंड और असम जैसे राज्यों में बाल विवाह की दर 30 प्रतिशत से ऊपर है। इन आँकड़ों से साफ है कि समस्या किसी एक धर्म या समुदाय की नहीं, बल्कि सामाजिक संरचना और पिछड़ेपन से जुड़ी है। लेकिन जब न्यायालय पर्सनल लॉ के आधार पर बाल विवाह को वैध ठहराते हैं, तो यह सामाजिक समस्या और गहरी हो जाती है।

अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य और भारत की प्रतिबद्धताः भारत ने संयुक्त राष्ट्र बाल अधिकार संधि (यूएनसीआरसी) पर 1992 में हस्ताक्षर किए। इस संधि के अनुसार 18 वर्ष से कम आयु का हर व्यक्ति बच्चा है और उसकी सुरक्षा सुनिश्चित करना राज्य का दायित्व है। भारत ने सतत विकास लक्ष्य (एसडीजी-5.3) के तहत 2030 तक बाल विवाह समाप्त करने का संकल्प भी लिया है। महत्वपूर्ण यह है कि कई मुस्लिम-बहुल देशों जैसे इंडोनेशिया, मलेशिया और बांग्लादेश ने विवाह की न्यूनतम आयु 18 वर्ष तय की है। बांग्लादेश ने 2017 में बाल विवाह निषेध अधिनियम लाकर नाबालिग विवाह को अपराध घोषित किया। यह स्पष्ट करता है कि यह धर्म का नहीं, बल्कि बच्चों की सुरक्षा और सामाजिक सुधार का वैश्विक एजेंडा है।

मुस्लिम समाज के भीतर सुधार की आवाजः मुस्लिम समाज के भीतर भी बड़ी संख्या में लोग बाल विवाह का विरोध कर रहे हैं। अनेक मुस्लिम महिला संगठन और सामाजिक कार्यकर्ता इस बात पर जोर देते हैं कि इस्लाम बाल विवाह को बढ़ावा नहीं देता। पैगंबर मोहम्मद की शिक्षाओं में विवाह परिपक्वता और सहमति पर आधारित बताया गया है, न कि केवल शारीरिक यौवन पर। इसलिए सुधार की मांग बाहर से थोपी हुई नहीं, बल्कि समुदाय के भीतर से भी आ रही है। कम उम्र में विवाह केवल कानूनी समस्या नहीं है, बल्कि इसके सामाजिक और स्वास्थ्य पर दूरगामी दुष्परिणाम होते हैं। किशोरावस्था में गर्भधारण से मातृ मृत्यु दर कई गुना बढ़ जाती है। जल्दी विवाह से बच्चियों की शिक्षा अधूरी रह जाती है और आत्मनिर्भर बनने का सपना टूट जाता है। नाबालिग मातृत्व से जनसंख्या वृद्धि की गति तेज होती है, जिससे संसाधनों पर बोझ बढ़ता है। खेल, शिक्षा, कला और विज्ञान में संभावित प्रतिभाएँ असमय विवाह के कारण घर की चारदीवारी तक सीमित हो जाती हैं। मानसिक स्वास्थ्य पर भी गहरा असर पड़ता है। जल्दी विवाह करने वाली बच्चियों में अवसाद और आत्महत्या की प्रवृत्ति अधिक पाई जाती है।

उच्चतम न्यायालय का हस्तक्षेप आवश्यकः पॉक्सो अधिनियम में 2019 के संशोधन द्वारा कठोर दंड प्रावधान किए गए, जिनमें नाबालिगों के साथ बलात्कार पर मृत्युदंड तक का प्रावधान है। यह संकेत है कि संसद और सरकार दोनों बच्चों की सुरक्षा को लेकर गंभीर हैं। लेकिन यदि अदालतें पर्सनल लॉ का हवाला देकर इन प्रावधानों को निष्प्रभावी बना दें, तो यह सख्ती केवल कागज पर रह जाएगी। अब समय आ गया है कि उच्चतम न्यायालय संविधान पीठ गठित कर यह स्पष्ट करे कि पॉक्सो और बाल विवाह निषेध अधिनियम सभी व्यक्तिगत कानूनों से ऊपर हैं। संसद को भी चाहिए कि पॉक्सो अधिनियम में एक स्पष्ट प्रावधान जोड़ा जाए, जो बच्चों की सुरक्षा को सभी पर्सनल लॉ से ऊपर रखे। साथ ही, एनसीपीसीआर जैसी संस्थाओं को न्यायपालिका में सीधे जाने का अधिकार दिया जाए। भारत को यह संदेश स्पष्ट रूप से देना होगा कि बच्चियों की सुरक्षा, शिक्षा और गरिमा ही असली राष्ट्र धर्म है। कोई भी परंपरा, पर्सनल लॉ या सामाजिक प्रथा बच्चियों के अधिकारों से ऊपर नहीं हो सकती।

कम उम्र में विवाह केवल एक लड़की का नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र का भविष्य बर्बाद करता है। वह बच्ची, जो कल वैज्ञानिक, चिकित्सक, नेता या शिक्षक बन सकती थी, असमय विवाह के कारण अपने सपनों और प्रतिभा से वंचित हो जाती है। यदि भारत को 2047 तक विकसित राष्ट्र बनना है तो हर बच्ची को 18 वर्ष तक सुरक्षित, शिक्षित और स्वतंत्र भविष्य गढ़ने का अवसर देना होगा। यही संविधान की आत्मा है, यही सभ्यता का मर्म है और यही राष्ट्र की प्रगति का वास्तविक मार्ग भी है।

(लेखिका, वकील और मध्‍य प्रदेश बाल अधिकार संरक्षण आयोग की सदस्‍य हैं।)