छोटी उम्र से सेक्स एजुकेशन का सवाल और इससे पैदा होने वाले खतरे
सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि स्कूलों में यौन शिक्षा की शुरुआत कक्षा नौ से नहीं, बल्कि छोटी उम्र से ही की जानी चाहिए। न्यायमूर्ति संजय कुमार और आलोक अराधे की खंडपीठ ने यह बात उस मामले की सुनवाई के दौरान कही, जिसमें 15 वर्षीय किशोर पर यौन अपराध के आरोप लगे थे। कोर्ट का मानना है कि बच्चों को यौवन से पहले ही यह समझ दी जानी चाहिए कि शरीर में होने वाले जैविक परिवर्तन क्या हैं और उनसे जुड़ी जिम्मेदारियाँ क्या हो सकती हैं।
अब भले ही ये टिप्पणी संवेदनशील और समयानुकूल प्रतीत होती हो लेकिन इसने समाज में एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है; क्या भारत जैसे परंपरागत समाज में कम उम्र से सेक्स एजुकेशन देना उचित है? क्या इससे जागरूकता बढ़ेगी या एक नई सामाजिक अव्यवस्था की शुरुआत होगी?
भारतीय समाज का सांस्कृतिक आधार
भारत की सामाजिक संरचना पश्चिम से भिन्न है। यहाँ जीवन को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष जैसे पुरुषार्थों में बाँटकर संयम, मर्यादा और ब्रह्मचर्य पर विशेष बल दिया गया है। भारतीय परिवारों में बच्चों को सीमाओं और नैतिक मूल्यों का बोध कराया जाता है। पारंपरिक दृष्टि में युवा को 25 वर्ष की आयु तक ब्रह्मचर्य में रहकर गृहस्थ जीवन के लिए तैयार होने की अपेक्षा की जाती है। ऐसे में कहना होगा कि बचपन से ही सेक्स एजुकेशन का विचार भारतीय मूल्य-व्यवस्था से टकराता प्रतीत होता है।
यदि बच्चों को कम उम्र में गर्भनिरोध, शारीरिक संबंध या ‘सहमति आधारित संबंधों’ के बारे में पढ़ाया जाने लगे, तो यह केवल ज्ञान तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि जिज्ञासा और प्रयोग की प्रवृत्ति को भी जन्म देगा। मनोविज्ञान कहता है कि जितनी जल्दी किसी विषय की जानकारी मिलती है, उतनी ही जल्दी उसके प्रति जिज्ञासा और प्रयोग की इच्छा भी बढ़ती है।
पश्चिम का अनुभव और परिणाम
यूरोप और अमेरिका में पिछले पाँच दशकों से स्कूलों में सेक्स एजुकेशन दी जा रही है। उद्देश्य यह था बच्चों को असुरक्षित यौन संबंधों और अवांछित गर्भ से बचाना, किंतु नतीजे कुछ और निकले। ब्रिटेन में 15 वर्ष से कम आयु की किशोरियों के गर्भवती होने की घटनाएँ विश्व में सबसे अधिक हैं। स्वीडन, नॉर्वे और नीदरलैंड जैसे देशों में किशोर मातृत्व सामान्य हो चुका है। वहाँ राज्य सरकारें उन बच्चों की परवरिश करती हैं जिनके माता-पिता खुद किशोर होते हैं।
इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि ज्ञान देने से पहले यदि संयम और जिम्मेदारी की भावना न सिखाई जाए, तो शिक्षा अपने उद्देश्य से भटक जाती है। पश्चिम में बच्चों ने यह मान लिया कि “यदि सुरक्षित उपाय हैं तो प्रयोग करना गलत नहीं।” यही सोच सामाजिक और नैतिक ढाँचे को कमजोर करती है।
भारत में संभावित खतरे
भारत में छोटी उम्र से सेक्स एजुकेशन लागू करने पर सबसे बड़ा खतरा कम उम्र में संबंधों के प्रचलन का है। जब स्कूलों में गर्भनिरोध, सहमति और यौन व्यवहार पर खुली चर्चा होगी, तो बच्चों में इसे जानने और आजमाने की प्रवृत्ति बढ़ना स्वभाविक है। इससे स्कूलों का अनुशासन प्रभावित होना तय है और शिक्षक–छात्र के संबंधों में आवश्यक मर्यादा कमजोर पड़ेगी ही। इसके अलावा परिवारिक संवाद में भी असहजता बढ़ेगी। भारतीय परिवार अब भी “लज्जा” और “संकोच” को नैतिकता का हिस्सा मानते हैं। जब बच्चे स्कूल में सेक्स पर खुली बातचीत करेंगे तो घर और स्कूल के मूल्यों के बीच टकराव पैदा होगा। माता-पिता असमंजस में पड़ेंगे कि वे बच्चों को किस दिशा में मार्गदर्शन दें।
संस्कृति बनाम आधुनिकता
सेक्स एजुकेशन का विरोध करने का अर्थ अज्ञानता को बढ़ावा देना नहीं है। जानकारी जरूरी है, लेकिन उसकी सीमा और शैली तय होनी चाहिए। यौवन की उम्र में शरीर में होने वाले परिवर्तनों के बारे में बच्चों को सही जानकारी देना आवश्यक है, पर यह ज्ञान “संस्कारों” के साथ संतुलित होना चाहिए। यदि यह शिक्षा केवल शारीरिक क्रिया या गर्भनिरोध तक सीमित रही, तो यह ज्ञान नहीं बल्कि भ्रम साबित हो सकती है। सेक्स एजुकेशन को “नैतिक शिक्षा” का हिस्सा बनाना जरूरी है, जहाँ बच्चों को समझाया जाए कि यौन संबंध केवल शारीरिक नहीं, बल्कि भावनात्मक और सामाजिक जिम्मेदारी भी हैं।
धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से असंगति
भारतीय परंपरा में काम को पुरुषार्थ के रूप में स्वीकार किया गया, पर उसे धर्म और मर्यादा के भीतर रखा गया। विवाहपूर्व संबंधों को अनुचित माना गया है क्योंकि समाज का नैतिक ढाँचा परिवार पर आधारित है। यदि 12–14 वर्ष की उम्र में बच्चों को “सहमति आधारित संबंधों” के बारे में पढ़ाया गया, तो आप यह मान कर चलें कि ये परंपरागत मूल्य-व्यवस्था से सीधा टकराव होगा। इससे समाज में नैतिक पतन और पारिवारिक असंतुलन की आशंका बढ़ेगी।
क्या भारत तैयार है?
आज भी भारत के अधिकांश परिवारों में सेक्स पर खुली चर्चा असहज विषय है, विशेषकर ग्रामीण और छोटे शहरों में। यदि बच्चे स्कूल में जाकर सुनेंगे कि “यौन संबंध सामान्य हैं” या “गर्भनिरोध सुरक्षित उपाय है”, तो उनके मन में विरोधाभास उत्पन्न होगा। यह भ्रम उनकी मानसिकता को प्रभावित कर सकता है और मूल्यहीन पीढ़ी का निर्माण कर सकता है।
यहां कुल मिलाकर कहना यही है कि पश्चिम ने जल्दबाजी में जो गलती की, भारत उसे दोहरा नहीं सकता। यह देश परिवार, संस्कृति और संयम की नींव पर टिका है। यदि इन नींवों को कमजोर किया गया, तो समाज का संतुलन डगमगा जाएगा। इसलिए, सेक्स एजुकेशन कम से कम भारत के संदर्भ में फिलहाल नौवीं के पहले देना जरा भी आवश्यक प्रतीत नहीं होता है।

