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आत्मनिर्भर विकास के लिए अनुसंधान और नवाचार को बढ़ावा देने की आवश्यकता

उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता के बाद भारत द्वारा अपनाई गई संरक्षणवादी आत्मनिर्भरता की अवधारणा और 90 के दशक की वैश्वीकरण नीति के स्थान पर कोरोना संकट ने स्थानीय से वैश्विक स्तर तक अर्थव्यवस्था को सशक्त बनाने के लिए आत्मनिर्भर भारत के विचार को जन्म दिया है। वैश्विक उथल-पुथल व्यापार में अंतर्राष्ट्रीय संपर्क के मॉडल को लेकर दुविधा पैदा कर सकती है, लेकिन सतत विकास के लिए स्थानीय स्तर पर आत्मनिर्भरता नि:संदेह आवश्यक है।

इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय, अमरकंटक की द्वितीय विषय विशेषज्ञ प्रो. नीति जैन ने कहा कि आदिवासी और स्थानीय समुदायों के पास उत्पाद, ज्ञान, बुद्धि और कौशल हैं जो मनुष्य, प्रकृति और समाज पर निर्भर करते हैं। डिंडोरी के बैगा समुदाय की हर्बल औषधियां, पाटनागर के गोंड कलाकारों की चित्रकारी, मिथिला क्षेत्र की मखाना की खेती और ऐसे अन्य स्थानीय उत्पादों ने उनकी पहुंच को व्यापक रूप से बढ़ाया है। इस तरह के स्थानीय सशक्तिकरण और वैश्विक एकीकरण से सतत प्रगति हो सकती है।

उज्जैन संभाग के उच्च शिक्षा विभाग के अतिरिक्त निदेशक डॉ. एच.एल. अनिजवाल ने कहा कि वोकल फॉर लोकल रोजगार की समस्या का समाधान कर सकता है और देश को वैश्विक स्तर पर विकास के उच्चतम स्तर पर ले जा सकता है।

अध्यक्षीय भाषण में प्राचार्य डॉ. प्रशांत पुराणिक ने कहा कि स्थानीय उत्पादों को सीमा पार के बाजारों तक पहुंचाने और विकसित भारत के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए पैकेजिंग, ब्रांडिंग और मानकीकरण जैसे बैकवर्ड और फॉरवर्ड लिंकेज को मजबूत किया जाना चाहिए। स्वागत भाषण डॉ. जी.डी. अग्रवाल ने दिया और अतिथि परिचय डॉ. दिनेशचंद्र खंडेलवाल ने दिया। वेबिनार संयोजक एवं आईक्यूएसी समन्वयक डॉ. नीता तपन ने विषयगत परिचय दिया। संचालन डॉ. अर्चना मेहरा ने किया। तकनीकी सहयोग विवेक दुबे ने किया। अध्यक्षता डॉ. रश्मि भार्गव ने की। देश के विभिन्न हिस्सों से आए प्रतिभागियों ने शोधपत्र प्रस्तुत किए। आभार डॉ. सुनील चौधरी ने माना।