लोकतंत्र में युद्ध का कोई स्थान नहीं, युद्ध लोकतांत्रिक व्यवस्था में बाधा
वाराणसी, 13 नवम्बर । लगभग 112 वर्ष पूर्व गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर को साहित्य के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार मिला था। उसी ऐतिहासिक अवसर की स्मृति में काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) ने इस वर्ष साहित्य, अर्थशास्त्र और शांति के क्षेत्रों में दिए गए नोबेल पुरस्कारों पर आधारित “नोबेल पुरस्कार व्याख्यान श्रृंखला” का आयोजन गुरुवार को किया। बतौर मुख्य वक्ता विश्वभारती विश्वविद्यालय, शांतिनिकेतन के प्रो. अमृत सेन ने “मेड स्ट्रेंजर ए ब्रदर: टैगोर, क्रास्नाहोर्काई एंड द नोबेल प्राइज इन लिटरेचर” विषय पर व्याख्यान दिया।
उन्होंने रवीन्द्रनाथ टैगोर और इस वर्ष के साहित्य के नोबेल विजेता लास्ज़लो क्रास्नाहोर्काई के विचारों में निहित समानताओं पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यद्यपि दोनों चिंतक लगभग एक शताब्दी के अंतराल से अलग हैं, फिर भी उनकी रचनाओं में मानवता, नैतिकता और अस्तित्व के प्रश्नों की गहरी प्रतिध्वनि सुनाई देती है। प्रो. सेन ने टैगोर की अंतिम रचना क्राइसिस एंड सिविलाइजेशन का उल्लेख करते हुए कहा, “मनुष्य में विश्वास खोना पाप है।” उन्होंने बताया कि क्रास्नाहोर्काई की रचनाएं भी प्रलयकालीन स्थितियों में मानव धैर्य और उसके पुनर्निर्माण की खोज प्रस्तुत करती हैं, जो टैगोर की विचारधारा से एक अद्भुत संवाद स्थापित करती हैं।
जादवपुर विश्वविद्यालय के प्रो. शिबाशीष चटर्जी ने भारत और लैटिन अमेरिका के ऐतिहासिक व सांस्कृतिक संबंधों पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि भारत और वेनेज़ुएला के बीच लंबे समय से सौहार्दपूर्ण संबंध रहे हैं। लोकतंत्र के संदर्भ में उन्होंने कहा, “लोकतंत्र में युद्ध के लिए कोई स्थान नहीं, क्योंकि युद्ध लोकतांत्रिक मूल्यों को कमजोर करता है।”
आईआईटी बॉम्बे के अशंक देसाई सेंटर फॉर पॉलिसी स्टडीज़ के प्रो. विनीश कथूरिया ने अर्थशास्त्र के क्षेत्र में ‘क्रिएटिव डिस्ट्रक्शन’ या ‘रचनात्मक विनाश’ की अवधारणा पर विस्तृत प्रकाश डाला ।
इस अवसर पर बीएचयू के कुलपति प्रो. अजित कुमार चतुर्वेदी ने कहा कि नोबेल पुरस्कार हमें सभी विषयों की मौलिक एकता की याद दिलाते हैं। उन्होंने कहा कि सच्चा अनुसंधान केवल शीर्ष जर्नलों में प्रकाशन तक सीमित नहीं होता। नोबेल पुरस्कार लंबे सी.वी. या असंख्य प्रकाशनों के लिए नहीं, बल्कि उन मौलिक विचारों के लिए दिए जाते हैं जो किसी विषय की समझ को मूल रूप से बदल देते हैं। उन्होंने वैश्विक आलोचनात्मक समीक्षा के महत्व पर कहा कि ऐसा शोध ही वास्तव में मूल्यवान होता है जो विश्व स्तर पर कठोर समीक्षा के बाद भी अपनी सार्थकता सिद्ध कर सके।
व्याख्यानमाला सामाजिक विज्ञान संकाय और कला संकाय के संयुक्त तत्वावधान में हुआ। उद्घाटन सत्र में संकाय प्रमुख प्रो. अशोक कुमार उपाध्याय ने स्वागत भाषण दिया, जबकि प्रो. सुषमा घिल्डियाल ने औपचारिक धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया। संचालन अर्थशास्त्र विभाग के प्रो. राकेश रमन ने किया।

