Rajasthan

ब्रज संवादोत्सव में हुआ विचार, कला और साहित्य का अद्भुत संगम

भरतपुर, 23 जनवरी । ब्रज मंथन और महारानी श्री जया महाविद्यालय के संयुक्त तत्वावधान में ब्रज संवादोत्सव के तीसरे संस्करण का आयोजन महाविद्यालय के सेंट्रल हॉल में शुक्रवार को किया गया। इस कार्यक्रम में विभिन्न सत्रों में विभिन्न वार्ताएँ एवं पुस्तक चर्चाएँ प्रस्तुत की गईं। कार्यक्रम का औपचारिक आरंभ सरस्वती वंदना एवं दीप प्रज्वलन से हुआ। सरस्वती वंदना की प्रस्तुति रोहित एवं मनप्रीत ने दी। आरम्भिक सत्र में डॉ. ओमप्रकाश भार्गव की पुस्तक ‘कुटुम्बकम’ एवं डॉ. लहरी राम मीना की संपादित पुस्तक ‘हिन्दू संस्कृति और सत्तावादी राजनीति’ का विमोचन मनोज जी द्वारा किया गया।

लहरी राम मीणा की पुस्तक हिन्दू संस्कृति की गहराइयों को सामने रखती है। लहरी राम मीणा ने बताया कि हिन्दू संस्कृति सत्य के अन्वेषण की प्रक्रिया है और सत्य का प्रत्येक साधन हिन्दू धर्म में पवित्र माना जाता है। डॉ. ओमप्रकाश भार्गव की पुस्तक ‘कुटुम्बकम’ लघुकथाओं एवं संस्मरणों का संकलन है। जिसमें लेखक का संघर्ष आयातित नहीं है, मौलिक है, स्वयं भोग हुआ है, यथार्थ है। उनकी कहानियाँ परिवार की विसंगति को चित्रित करते हुए भी परिवार को जोड़नेकाम करती हैं।

कार्यक्रम के प्रथम सत्र में श्रीधर पराड़कर द्वारा रचित पुस्तक ‘तत्वमसि’ पर चर्चा की गई। इस सत्र के वार्ताकार प्रगति गुप्ता एवं टीना शर्मा जी रहे। यह पुस्तक उपन्यास शैली में लिखी गयी है। यह पुस्तक पारितोष बाबू के माध्यम से समाज को जीवन समर्पित करने वाले स्वयंसेवकों, प्रचारकों के जीवन को हमारे सामने रखती है। इस पुस्तक का केंद्रीय भाव इसी पुस्तक की पंक्तियों से सामने आता है ” कोई भी शब्द ऐसा नहीं है जिसका उपयोग मंत्र में न होता हो। कोई भी वस्तु ऐसी नहीं है जिसका उपयोग औषधि में न होता हो। कोई भी व्यक्ति अयोग्य नहीं है। यह सब निर्भर उपयोगकर्ता पर करता है।” इस चर्चा में वार्ताकारों से आगे बताया कि स्वयंसेवक के मन का मूल भाव सेवा है। जिसे ध्येय मानकर ही वह समाज की रणभूमि में उतरता है। स्वयंसेवक का अर्थ ही है कि जब हम अपने प्रति चैतन्य रहते हैं, तो हम राष्ट्र के प्रति चैतन्य रहते हैं। यह पुस्तक व्यक्ति और राष्ट्र जीवन के विविध आयामों को समेटे हुए है।

कार्यक्रम के द्वितीय सत्र ‘पुराणों में भारत’ में प्रो. शिवकुमार मिश्र ने पुराणों में भारतीय संस्कृति के चित्रण को हमारे सामने रखा। पुराण केवल प्राचीन कथा संग्रह न होकर हमारी संस्कृति के विभिन्न उपादानों के उद्गम स्रोत हैं। पुराणों में उज्जैन महाकाल, अयोध्या नगरी, सरस्वती नदी, 16 संस्कारों, नक्षत्र काल गणना यहाँ तक कि सृष्टि के आरंभ तक का उल्लेख मिलता है। आज के विभिन्न शास्रों जैसे वनस्पति शास्त्र, इतिहास, राजनीति शास्त्र, संस्कृति आदि का उल्लेख मिलता है।

कार्यक्रम के तृतीय सत्र ‘ दास्तान-ए- शंकर’ में भारती दीक्षित जी ने काव्य-किस्सा शैली में आदि शंकराचार्य की जीवनगाथा को मार्मिक अभिव्यक्ति दी।

कार्यक्रम के चतुर्थ सत्र में नीति वर्मा जी ने ‘ई-पुस्तकालय एवं डिजिटल पठन पर चर्चा’ की गई। इसमें राष्ट्रीय पुस्तक न्यास द्वारा विकसित डिजिटल पठन के एप एवं वेबसाइट जो आज के किशोर एवं युवा विद्यार्थियों हेतु अत्यंत उपयोगी टूल है, पर नीति वर्मा ने विस्तार से चर्चा की। कार्यक्रम के आखिरी सत्र में काकोरी कांड पर आधारित लघु फ़िल्म डॉक्यूमेंट्री का प्रदर्शन किया गया।

कार्यक्रम में जैनेंद्र अग्रवाल, मीनू गेरा भसीन, विवेक गुप्ता, डॉ. सौम्य परमार, भगीरथ, संजय डांगी, राहुल खींची आदि उपस्थित रहे।