Rajasthan

थैलीसीमिया पीड़ितों के इलाज को सरकार प्रतिबद्ध, डे-केयर सेंटरों पर निःशुल्क सुविधा

जयपुर, 13 फ़रवरी । सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री अविनाश गहलोत ने शुक्रवार को विधानसभा में कहा कि राज्य सरकार थैलीसीमिया जैसी गंभीर एवं अनुवांशिक बीमारी से पीड़ित बच्चों के प्रति संवेदनशील है और उन्हें त्वरित एवं निःशुल्क उपचार उपलब्ध कराने के लिए लगातार प्रयासरत है।

उन्होंने बताया कि भरतपुर को छोड़कर प्रदेश के सभी छह संभाग मुख्यालयों पर थैलीसीमिया मरीजों के लिए डे-केयर सेंटर संचालित किए जा रहे हैं, जहां बिना रिप्लेसमेंट के रक्त चढ़ाने, आयरन चिलेशन थैरेपी तथा आवश्यक जांचें निःशुल्क उपलब्ध कराई जाती हैं।

मंत्री ने बताया कि बोन मैरो ट्रांसप्लांट के लिए राज्य सरकार की ओर से 10 लाख तक की वित्तीय सहायता दी जाती है। साथ ही मुख्यमंत्री आयुष्मान आरोग्य योजना (मा योजना) में भी इस बीमारी के कैशलैस उपचार की सुविधा उपलब्ध है।

उन्होंने बताया कि वर्तमान में प्रदेश में 1105 थैलीसीमिया मरीज पंजीकृत हैं, जिनमें से 797 बच्चे 18 वर्ष से कम आयु के हैं। इन मरीजों को 1250 रुपये प्रतिमाह पेंशन दी जा रही है। पिछले दो वर्षों में महात्मा गांधी चिकित्सालय जयपुर में 53 थैलीसीमिया मरीजों का बोन मैरो ट्रांसप्लांट किया गया है, जबकि अन्य बीमारियों सहित कुल 64 ट्रांसप्लांट हुए हैं।

प्रश्नकाल के दौरान सदस्य रुपिंद्र सिंह कुन्नर के पूरक प्रश्नों का जवाब देते हुए गहलोत ने बताया कि गत वर्ष मुख्यमंत्री आयुष्मान बाल संबल योजना लागू की गई थी, जिसमें नेशनल हेल्थ मिशन की सूची से 52 बीमारियां शामिल हैं। इस योजना के तहत 50 लाख रुपये तक का उपचार और 5000 रुपये की मासिक सहायता दी जाती है, हालांकि वर्तमान में थैलीसीमिया इसमें शामिल नहीं है। सरकार से इसे योजना में शामिल करने का आग्रह किया गया है।

मंत्री ने कहा कि थैलीसीमिया एक अनुवांशिक रोग है, जो माता-पिता से बच्चों में स्थानांतरित होता है और मरीज को नियमित अंतराल पर रक्त चढ़ाने की आवश्यकता होती है। इसका स्थायी उपचार बोन मैरो ट्रांसप्लांट से ही संभव है। इससे पूर्व विधायक कुन्नर के मूल प्रश्न के लिखित उत्तर में मंत्री ने बताया कि चिकित्सा महाविद्यालयों में थैलीसीमिया पीड़ितों के लिए डे-केयर सेंटर संचालित हैं, जहां रक्ताधान, आयरन चिलेशन थैरेपी और सभी जांचें निःशुल्क उपलब्ध हैं। गंभीर मरीजों के लिए वार्ड सुविधा एवं बोन मैरो ट्रांसप्लांट भी निःशुल्क कराया जा रहा है।

उन्होंने बताया कि थैलीसीमिया को दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम 2016 के तहत 21 दिव्यांगता श्रेणियों में शामिल किया गया है और मरीजों को यूडीआईडी कार्ड/दिव्यांगता प्रमाण पत्र जारी किए जा रहे हैं।

उन्होंने बताया कि जन्म से पीड़ित बच्चे का पांच वर्ष की आयु तक माता-पिता के आधार कार्ड से इलाज किया जाता है। पांच वर्ष के बाद बच्चे के आधार में बायोमैट्रिक अपडेट होने पर उसकी आईडी से उपचार किया जाता है। जिन बच्चों का बायोमैट्रिक सत्यापन संभव नहीं है, उनकी पेंशन स्वीकृति संबंधित अधिकारी द्वारा जांच के बाद आधार से जुड़े मोबाइल नंबर पर ओटीपी के माध्यम से की जाती है।