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समीक्षाः गागर में सागर है राष्ट्र के स्व जागरण के लिये हिन्दी विवेक का ग्रंथ दीप स्तंभ

मुंबई से छपने वाली “हिन्दी विवेक पत्रिका ने एक ग्रंथ “राष्ट्र के स्व जागरण का दीप स्तंभ” निकाला है। 426 पृष्ठ के इस ग्रंथ की सामग्री राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शताब्दी यात्रा पर केंद्रित है। इस ग्रंथ में संघ के विविध आयामों पर सामग्री संजोई गई है। मानों यह गागर में सागर है। राष्ट्रीय और सांस्कृतिक विषयों पर केंद्रित अनेक पत्रिकाएँ प्रकाशित होतीं। समय समय पर उनके विशेषांक भी प्रकाशित हुये हैं। उनमें कुछ विशेषांक पठनीय भी रहे हैं। इसी श्रृंखला में पत्रिका “मासिक हिन्दी विवेक” का राष्ट्र के स्व जागरण का यह ग्रंथ “दीपस्तंभ” प्रकाशित हुआ है। पत्रिका हिन्दी विवेक मुम्बई से प्रकाशित होती है। भारत राष्ट्र का “परम वैभव” और समाज में “सांस्कृतिक पुनर्जागरण” पत्रिका का मुख्य ध्येय है। “हिन्दी विवेक”ने समय समय पर अपने कयी विशेषांक और शोधपरक ग्रंथ प्रकाशित किये हैं।

इसी शृंखला में “दीप स्तंभ” है जो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शताब्दी यात्रा पर केन्द्रित है। इसमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ शताब्दी यात्रा के विभिन्न आयामों को केंद्र में रखकर सामग्री संजोई गई है। इसके आलेख, उनका प्रस्तुतिकरण और संघ की पूरी शताब्दी यात्रा का सैद्धांतिक विवेचन पठनीय है। इस ग्रंथ में पचास से अधिक लेखकों के कुल बावन आलेख और एक कविता है। आलेखों में संघ की यात्रा, ध्येय और उद्देश्य का तो विवेचन है ही, इसके साथ अधिकांश आलेखों में अपने विषय के साथ राष्ट्र के स्वत्व और स्वाभिमान कारक तत्वों का विवेचन भी है। जो सामान्य पाठक को भी राष्ट्रवोध के चिंतन की ओर प्रेरित करता है।

426 पृष्ठों का यह ग्रंथ कुल नौ भागों में विभाजित है। पहला भाग “संकल्पना” का है। इसमें पांच आलेख हैं। यह आलेख संघ कार्य की नींव, अंकुरण से लेकर बटवृक्ष की ओर यात्रा का विवेचन है, एक आलेख इन सौ वर्षों में संघ के सामने आई चुनौतियों की के बीच व्यक्ति निर्माण से राष्ट्र निर्माण के सुसंकल्प जैसे विषय लिये गये हैं। भैयाजी जोशी और मनमोहन जी वैद्य जैसे साधक चिंतकों के आलेखों के साथ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वर्तमान सरसंघचालक डाॅ. मोहन भागवत जी का साक्षात्कार भी इसी भाग में है। यह सामग्री 53 पृष्टों में है।

ग्रंथ का दूसरा भाग “बीजारोपण” है। इस भाग में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डाॅक्टर हेडगेवार जी के मन में संघ संस्थापना के विचारों की पृष्ठभूमि, समय की चुनौतियों के बीच संगठन की यात्रा और लक्ष्य के अनुरुप, कालानुप दिशा, कार्यकर्ता तैयार करने का कौशल जैसे विषयों का विवेचन है। यह भाग कुल बत्तीस पृष्ठों का है। राष्ट्रसेविका संघ की प्रमुख संचालिका शांता कुमारी जी का साक्षात्कार भी इस भाग में है। तीसरा भाग “संगठन” है। इस भाग में संघ की राष्ट्रीय दृष्टि, प्राथमिकता, राष्ट्रभक्ति आध्यात्म चेतना और सामाजिक संवेदना का समावेश जैसे विषय लिये गये हैं। इन विषयों को समझाने केलिये संघ के द्वितीय सरसंघचालक गोलवलकर जी उपाख्य गुरुजी का चीन चिंतन और राष्ट्रनीति का विवेचन भी किया गया है। यह भाग कुल पैंतालीस पृष्ठ का है। ग्रंथ का चौथा भाग “विस्तार” है। इसमें रामजन्म भूमि आँदोलन, आपातकाल में संघ का संघर्ष, संघ का वैश्विक विस्तार, जैसे विषय लिये गये हैं।

संघ के तृतीय सरसंघचालक देवरस जी के चिंतन और कार्य विस्तार का विवेचन भी इस भाग में है। यह भाग 49 पृष्ठ का है। ग्रंथ का पांचवा भाग “अनुभव” चौतीस पृष्ट का है। इसमें संघ की कार्यशैली पर पांच आलेख हैं। ग्रंथ का छठवां भाग “संस्था” है इसमें संघ द्वारा हिन्दु जागरण, संस्कार युक्त शिक्षा, वनवासियों को राष्ट्र की मूल धारा से जोड़ना, छात्र शक्ति में संस्कार वोध, श्रमिकों में राष्ट्रभाव को प्राथमिकता, साहित्य के द्वारा राष्ट्र जागरण और स्वदेशी भाव की जाग्रति जैसे विषयों पर आलेख हैं। यह भाग कुल अड़तालीस पृष्ठों का है। सातवां भाग “विमर्श” है। चालीस पृष्ठों के इस भाग में राष्ट्र के चुनौती के रूप में विषयों पर संघ की विचार यात्रा का विवेचन है। आठवाँ भाग संघ के “वैचारिक अनुष्ठान” का है। अट्ठावन पृष्टों के इस भाग में संगठित और वैभवपूर्ण भारत राष्ट्र केलिये आधारभूत वैचारिक आवश्यकता और प्राथमिकता का विवेचन है। और नवाँ अध्याय “संस्कार” है। पैंतालीस पृष्ठ के इस भाग में एक स्वयं सेवक संस्कारित बनाने, संघ के प्रतीक लक्ष्य की महत्ता, उत्सवों के स्वरूप की ध्येयता, शताब्दी वर्ष के लक्ष्य, पंच परिवर्तन आदि विषय हैं।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ संसार का एक मात्र ऐसा संगठन है जिसकी शैली जितनी सहज और सरल है लेकिन उसका वैचारिक अनुष्ठान उतना ही गहन और गंभीर है। सौ वर्षों की संघ यात्रा में प्रचारकों की पीढ़ियां बदलीं हैं लेकिन संघ का ध्येय, संकल्प और लक्ष्य में कोई विचलन नहीं आया। राष्ट्र के परम वैभव और समाज में साँस्कृतिक चेतना को जो संकल्प पहले दिन था वह आज भी है। संघ की यही विशेषता है जो संघ की साख और पहचान सबसे अलग रखती है। “हिन्दी विवेक” के इस ग्रंथ इन सब विन्दुओं, संघ शक्ति, ऊर्जा का आधार और स्वयंसेवकों की एकनिष्ठा का यथेष्ट चित्रण है। इस ग्रंथ की सामग्री पठनीय और अनुकरणीय भी है। अधिकांश लेखकों की भाषा प्रवाहमान है। जो सामान्य पाठक को भी सांस्कृतिक चेतना और राष्ट्रवोध की ओर प्रेरित करती है।

(समीक्षक, वरिष्ठ पत्रकार हैं।)