Uttarakhand

हर्षिल घाटी के सेब काश्तकारों पर मौसम और आपदा की दोहरी मार

बीते वर्षों हर्षिल घाटी में सेब के अच्छे उत्पादन से काश्तकारों के चेहरे खिले हुए थे। उद्यान विभाग के सर्वे की मानें तो बीते साल हर्षिल घाटी में 4000 मीट्रिक टन सेब उत्पादन हुआ था। गौरतलब है कि हर्षिल घाटी के सेब का अपने बड़े साइज और मिठास के लिए देश की बड़ी मंडियों में अपना एक अलग पहचान है। इस साल अच्छी बर्फबारी के साथ ही घाटी के सेब काश्तकारों को उत्पादन की अच्छी उम्मीद थी। जो कि अब सेब उत्पादन को देखते हुए सार्थक नजर आ रहा था। आपदा के बीच अभी सीमित मात्रा में सेब खरीददार हर्षिल घाटी पहुंचने लगे हैं तो वहीं, काश्तकारों को उम्मीद है कि इस आपदा काल में अगर शासन और प्रशासन मदद करता है तो अच्छी संख्या में सेब खरीददार मंडियों से हर्षिल घाटी पहुंचेंगे।

हर्षिल घाटी के काश्तकारों का कहना है कि बेमौसमी बर्फबारी, पतझड़ और अच्छी दवाइयां न मिलने के कारण कई काश्तकारों को सेब के ग्रेड घटने का डर सता रहा है। क्योंकि, ए और बी ग्रेड के सेब तो खरीददार ले रहे हैं, लेकिन बीमारी के कारण ही ग्रेड के सेबों को खरीददार नहीं मिल रहे हैं। क्योंकि, साल 2012-13 की आपदा में और कोरोना काल में भी पूर्ववर्ती सरकार ने यही मूल्य काश्तकारों को दिया था।जिससे इस आपदा में छोटे सेब काश्तकारों को लाभ मिल सके।

क्या कहते हैं अधिकारी

जिला उद्यान अधिकारी डॉ रजनीश सिंह ने बताया कि इस बार मार्च के महिने में जब सेब के पेड़ों पर फलौरिग हो रहा थी उस समय बर्फबारी होने से मधुमक्खियों और अन्य परागण करने वाले कीट बर्फबारी के समय सक्रिय नहीं हो पाते हैं। जिस कारण इस बार हर्षिल वैली में चार हजार मीट्रिक टन से घट कर करीब 250 हजार मीट्रिक टन सेब उत्पादन का अनुमान है जो कि सेब की फसलों के लिए बहुत नुकसानदायक रहा है।