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भारत में बाल विवाह उन्मूलन की दिशा और यूएन रिपोर्ट

भारत ने बाल विवाह रोकथाम में हाल के वर्षों में जो प्रगति हासिल की है, वह पूरी दुनिया के लिए प्रेरणादायक है। संयुक्त राष्ट्र की आम सभा के दौरान जारी रिपोर्ट “टिपिंग पॉइंट टू जीरो: एविडेंस टुवर्ड्स अ चाइल्ड मैरिज फ्री इंडिया” ने यह दर्शाया कि 2023 से अब तक भारत में चार लाख से अधिक बाल विवाह रोके गए। यह संख्या आँकड़ों की दृष्टि से तो महत्‍व रखती ही है, साथ में सामाजिक परिवर्तन की दिशा में यह एक निर्णायक क्षण का प्रतीक है। संयुक्त राष्ट्र महासचिव ने एक साल पूर्व जब कहा था कि मौजूदा गति से दुनिया को बाल विवाह मुक्त बनने में लगभग तीन सौ साल लगेंगे, तब किसी ने नहीं सोचा था कि भारत इतनी तेजी से प्रगति कर पाएगा।

आंकड़े कहते हैं, दुनिया के कुल बाल विवाहों में से लगभग एक तिहाई भारत में होते हैं। यह स्थिति केवल भारत की नहीं बल्कि वैश्विक स्तर पर भी चिंता का विषय रही है। यहां गरीबी, अशिक्षा एवं अन्‍य कारण मिलकर बाल विवाह को गहराई तक जड़ें जमाने में मदद की है। किंतु पिछले दो दशकों में सरकार, नागरिक समाज और बाल अधिकार संगठनों के संयुक्त प्रयासों ने इस सामाजिक समस्या को बदलने की दिशा में ठोस कदम उठाए। बाल विवाह निरोधक कानून लागू हुआ, लेकिन वास्तविक बदलाव तब शुरू हुआ जब कानूनी ढांचे के साथ सामाजिक जागरूकता और सामुदायिक भागीदारी को जोड़ा गया (Prohibition of Child Marriage Act, 2006)।

साल 2023-24 में ही नागर समाज, पंचायतों और कानूनी हस्तक्षेपों की मदद से 73,501 बाल विवाह रोके गए। इनमें से लगभग 59,364 मामले पंचायतों की सक्रिय भागीदारी से रोके गए, जबकि 14,137 मामले कानूनी कार्रवाई के कारण रुके (एनसीपीसीआर रिपोर्ट, 2024)। यह आँकड़ा इस बात का प्रमाण है कि पंचायतें और स्थानीय निकाय सक्रिय होने पर सामाजिक कुरीतियों को जड़ से उखाड़ सकती हैं। असम में बाल विवाह में 84 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई, वहीं महाराष्ट्र और बिहार में यह गिरावट लगभग 70 प्रतिशत रही (भारत सरकार, 2024)। यह केवल आँकड़े नहीं हैं, बल्कि उन हजारों बालिकाओं के जीवन से जुड़े तथ्य हैं जो समय से पहले विवाह के बंधन से बचीं और शिक्षा तथा भविष्य को सँवारने का अवसर प्राप्त किया।

राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर) ने इस अभियान में विशेष योगदान दिया है। आयोग ने लगातार राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों से डेटा एकत्र किया, उच्च-जोखिम वाले जिलों की पहचान की और लक्षित कार्यक्रम चलाए (एनसीपीसीआररिपोर्ट, 2024)। आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, वर्तमान में 27 राज्यों और 7 केंद्रशासित प्रदेशों में 11.5 लाख से अधिक बच्चे बाल विवाह के उच्च जोखिम में हैं। आयोग ने न केवल आँकड़ों पर ध्यान दिया, बल्कि जागरूकता अभियान, हेल्पलाइन, बालिकाओं के लिए शिक्षा पुनर्वास और पंचायतों के साथ समन्वय जैसी पहलों के माध्यम से जमीनी स्तर पर बदलाव सुनिश्चित किया।

सामाजिक संगठनों की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही है। 2023 में भारत सरकार ने 257 ऐसे जिलों की पहचान की जहाँ बाल विवाह की दर 23 प्रतिशत से अधिक थी। इसके लिए 270 संगठनों को जिम्मेदारी दी गई और प्रत्येक संगठन को 50 गाँवों में काम करने तथा कम से कम छह शादियाँ रोकने का लक्ष्य सौंपा गया। इन प्रयासों के सबूत पोर्टल पर अपलोड किए गए, जिससे पारदर्शिता सुनिश्चित हुई। कुछ ही महीनों में आंकड़ा चार लाख से अधिक तक पहुँच गया। यह रणनीति इस बात का उदाहरण है कि जब समाज के विभिन्न वर्गों को ठोस जिम्मेदारी और उत्तरदायित्व दिए जाते हैं तो परिणाम कितने ठोस हो सकते हैं।

हालाँकि उपलब्धियाँ अनेक हैं, चुनौतियाँ अभी भी बरकरार हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के अनुसार, 2022 में “प्रोहिबिशन ऑफ चाइल्ड मैरिज एक्ट, 2006” के तहत 3,563 मामले न्यायालयों में दर्ज हुए, लेकिन केवल 181 मामलों में मुकदमेबाजी पूरी हुई। यह दर्शाता है कि कानूनी प्रक्रिया अभी भी धीमी है और पीड़ितों को न्याय मिलने में विलंब होता है। यदि कानूनी व्यवस्था अधिक तेज और संवेदनशील बनाई जाए तो दोषियों को सजा मिल सकती है और समाज में प्रभावशाली संदेश जाएगा।

भारत में बाल विवाह की दर में पिछले तीन दशकों से निरंतर गिरावट आई है। राष्‍ट्रीय एवं अंतरराष्‍ट्रीय संस्‍थानों के कई अध्ययनों के अनुसार 1990 से 2005 तक यह दर लगभग एक प्रतिशत प्रति वर्ष घट रही थी, लेकिन पिछले दशक में यह गिरावट लगभग दो प्रतिशत प्रति वर्ष रही। यह रफ्तार इस बात का संकेत है कि भारत में सामाजिक चेतना और सरकारी नीतियाँ मिलकर ठोस परिवर्तन ला रही हैं।

शिक्षा और महिला सशक्तिकरण ने इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ जैसे अभियानों ने लिंगानुपात सुधारने के साथ-साथ बालिकाओं को शिक्षा से जोड़ने का अवसर दिया। जब बालिकाएँ स्कूल में रहती हैं तो विवाह की उम्र तक पहुँचने से पहले उनकी शादियाँ रोकना आसान हो जाता है (भारत सरकार, 2024)। स्व-सहायता समूहों और आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं की सक्रिय भागीदारी ने भी गाँव-गाँव में जागरूकता फैलाने में मदद की। पंचायत प्रतिनिधियों और सामुदायिक नेताओं के सहयोग ने इस सामाजिक कुरीति को तोड़ने में अहम योगदान दिया। निःस्‍संदेह इसके लिए केंद्र की मोदी सरकार धन्‍यवाद की पात्र है और साथ में वे राज्‍य सरकारें भी जिन्‍होंने इसमें रुचि प्रदर्श‍ित कर इसे गंभीरता से लिया।

भारत ने अब तक जो उपलब्धि हासिल की है वह न केवल अपने नागरिकों के लिए गर्व का विषय है बल्कि पूरी दुनिया के लिए प्रेरक उदाहरण है। जब दुनिया के सबसे अधिक बाल विवाहों वाला देश इतनी तेजी से इस कुरीति को कम करने में सफल हो सकता है तो अन्य देशों के लिए भी यह राहदर्शक बन सकता है। राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग के अथक प्रयास, पंचायतों की सक्रिय भागीदारी, सामाजिक संगठनों का सहयोग और सरकार की नीतियाँ मिलकर एक नई इबारत लिख रही हैं। यह इबारत केवल आँकड़ों की नहीं बल्कि करोड़ों बालिकाओं के सपनों और भविष्य की है।

आज जब भारत अमृतकाल की ओर बढ़ रहा है और विकसित राष्ट्र बनने का संकल्प ले रहा है, तब यह और भी आवश्यक है कि बाल विवाह जैसी कुरीतियों का पूर्ण उन्मूलन हो। क्योंकि कोई भी समाज तब तक सशक्त और विकसित नहीं हो सकता जब तक उसकी बेटियाँ स्वतंत्र, शिक्षित और सशक्त न हों। बाल विवाह को रोकना केवल कानून लागू करने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि यह एक सामाजिक आंदोलन है और भारत ने यह साबित कर दिया है कि यदि संकल्प मजबूत हो तो यह आंदोलन सफलता की नई ऊँचाइयाँ छू सकता है ।

फिर भी चुनौतियाँ अभी भी अनेक मौजूद हैं। गरीबी, अशिक्षा और सामाजिक दबाव आज भी बाल विवाह की सबसे बड़ी वजह हैं। कई बार परिवार आर्थिक बोझ कम करने या सामाजिक सुरक्षा के नाम पर बेटियों की कम उम्र में शादी कर देते हैं। लड़कियों की शिक्षा बीच में छूट जाती है और उनका जीवन घरेलू जिम्मेदारियों में सिमटकर रह जाता है। स्वास्थ्य संबंधी खतरे भी कम नहीं हैं। कम उम्र में गर्भधारण से मातृ एवं शिशु मृत्यु दर बढ़ जाती है, कुपोषण की समस्या गहराती है और महिला स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव पड़ता है। इसके लिए अभी भी हम सभी को मिलकर समाज के सहयोग से अनेक प्रयास करने की जरूरत है।

(लेखिका, मध्‍य प्रदेश बाल अधिकार संरक्षण आयोग की सदस्‍य हैं)