Himachal Pradesh

गिरिपार में सप्ताह भर दिवाली मनाने की परम्‍परा

दिवाली के दौरान अलग-अलग दिन अस्कली, धोरोटी, पटांडे, सीड़ो, तेलपकी व मूड़ा आदि पारम्परिक व्यंजन परोसे जाते हैं। दीपावली के अगले दिन पोड़ोई, दूज, तीच, चौथ व पंचमी पर ग्रेटर सिरमौर के कईं गांव में सांस्कृतिक संध्याओं का आयोजन किया जाता है, जिसमें से कुछ जगहों पर रामायण व महाभारत का मंचन किया जाता है।

गिरीपार के अंतर्गत आने वाले उपमंडल संगड़ाह, शिलाई, कफोटा व राजगढ़ की 154 के करीब पंचायतों में दिवाली को आज भी इसी तरह पारम्परिक अंदाज में मनाया जाता है। क्षेत्र में कुछ दशक पहले तक बिना पटाखे चलाए हुशू व दिए जलाकर इको फ्रेंडली ढंग से यह उत्सव मनाया जाता था, हालांकि अब देश के अन्य हिस्सों की देखा-देखी में आतिशबाजी दीपावली हिस्सा बन गई है। विशेष समुदाय से संबंध रखने वाले बूड़ेचू फोक कलाकार द्वारा इस दौरान होकू, सिंघा वजीर, चाय गीत, नतीराम व जगदेव आदि वीर गाथाओं गायन किया जाता है। लोक कलाकारों द्वारा चौलणा नामक विशेष परिधान में बूढ़ा नृत्य भी किया जाता है। सदियों से क्षेत्र में केवल दीपावली अथवा बूढ़ी दिवाली के दौरान ही बुड़ेछू नृत्य होता है तथा इसे बूढ़ा अथवा बुड़ियाचू नृत्य भी कहा जाता है।

स्थानीय लोग बुड़ेछू दल के सदस्यों को नकद बक्शीश के अलावा घी के साथ खाए जाने वाले पारम्परिक व्यंजन भी परोसते हैं तथा इस परम्परा को ठिल्ला कहा जाता है। सप्ताह भर की इस दिवाली के दौरान पोड़ोई पर गौवंश अथवा बैलों की पूजा तथा भैया दूज पर दामादों द्वारा अपनी सास को 100 अखरोट व मूड़ा आदि उपहार देकर उनका आशीर्वाद लेने की परम्परा भी सदियों से कायम है। बहरहाल क्षेत्र में सदियों से इस तरह दीपावली मनाने की परंपरा कायम है। एक माह बाद आने वाली अमावस्या से ग्रेटर सिरमौर कईं गांव में सप्ताह भर चलने वाली बूढ़ी दिवाली मनाई जाती है तथा कुछ गांवों में इसे मशराली के नाम से भी मनाया जाता है। ग्रेटर सिरमौर अथवा गिरिपार में दीपावली के अलावा लोहड़ी, गूगा नवमी, ऋषि पंचमी व वैशाखी आदि त्यौहार भी शेष हिंदोस्तान से अलग अंदाज में मनाए जाते हैं।