जज बनने के लिए दिव्यांगों को छूट पर सुप्रीम कोर्ट ने सभी हाई कोर्ट से मांगी राय
नई दिल्ली, 15 जनवरी । उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने सभी उच्च न्यायालयों और नेशनल लॉ यूनिवर्सिटीज से दिव्यांगों को जज बनने के लिए तीन वर्ष तक वकालत के अनुभव की अनिवार्यता से छूट देने पर राय मांगी है।
यह याचिका भूमिका ट्रस्ट ने दायर की है। याचिका में कहा गया है कि उच्चतम न्यायालय के 20 मई, 2025 के फैसले को चुनौती देते हुए कहा गया है कि ये दिव्यांगों के लिए लागू नहीं होना चाहिए। सुनवाई के दौरान उच्चतम न्यायालय ने कहा कि लीगल प्रैक्टिस की गिनती उस दिन से होती है जिस दिन से कोई लॉ ग्रेजुएट अपना प्रोविजनल एनरॉलमेंट कराता है न कि ऑल इंडिया बार एग्जामिनेशन पास करने के दिन से। किसी उम्मीदवार के तीन साल के लॉ प्रैक्टिस का सर्टिफिकेट या तो संबंधित प्रिंसिपल जज देता है या दस साल के अनुभव वाला कोई वकील।
उच्चतम न्यायालय ने 20 मई 2025 को कहा था कि जज बनने के लिए तीन वर्ष तक वकालत का अनुभव अनिवार्य है। कोर्ट ने कहा था कि वकालत का अनुभव किसी वकील के औपचारिक रूप से एनरॉल होने की तिथि से मान्य होगा। शुरुआत में जज के पद पर नियुक्त होने के लिए बतौर वकील तीन वर्ष का अनुभव अनिवार्य था, लेकिन 2002 में उच्चतम न्यायालय ने तीन वर्ष के अनुभव को समाप्त करते हुए नये लॉ ग्रेजुएट को भी जज के पद पर नियुक्ति के लिए आवेदन करने का रास्ता खोल दिया था।

