सांसद बलूनी पहुंचे निर्जन पातली गांव, प्रवासियाें से साल में एक पर्व मनाने के लिए आने का किया आग्रह
देहरादून, 30 जनवरी । पौड़ी गढ़वाल से लोकसभा सांसद एवं भाजपा के मुख्य प्रवक्ता व राष्ट्रीय मीडिया प्रमुख अनिल बलूनी आज शुक्रवार को पौड़ी जिले के कोट ब्लॉक स्थित पातली गांव पहुंचे। सांसद ने पातली और आसपास के प्रवासी ग्रामीणों से संवाद कर कई विषयों पर विस्तार से चर्चा की।
पौड़ी जिले के कोट ब्लॉक स्थित पातली के एक निर्जन गांव पहुंच कर बलूनी ने पलायन की समस्या पर लोगों का ध्यान आकर्षित
किया। गढ़वाल के पातली गांव के लोग पलायन कर चुके हैं। इनमें से तमाम लोग देहरादून और अन्य महानगरों से अपने गांव पातली पहुंचे थे। इसके अलावा आसपास के कई गांवों से भी बड़ी संख्या में लोग पातली आये थे। इन प्रवासियों से अनिल बलूनी ने वार्ता करने के दौरान कहा कि पहाड़ के गांवों का सुनसान होना कितना खतरनाक है, अपनी आंखों के सामने अपने ही गांव को घोस्ट विलेज बनते देखना कितना तकलीफदेह है। सभी प्रवासी ग्रामीणों की आँखों में अपने गाँवों के घोस्ट विलेज बन जाने की पीड़ा स्पष्ट दिख रही थी। वे अपने गांव को बचाने को लेकर काफी भावुक थे।
सांसद ने लोगों से अपील की कि हम सबको कम से कम एक लोकपर्व और अपने परिवार के कम से कम एक सदस्य का जन्मदिन अपने गांव में मनाना चाहिए। एक संतान का विवाह कार्यक्रम भी अपने गांव में करना चाहिए। उन्होंने कहा कि अगर हमने ऐसा किया तो हमारे बच्चे, हमारे परिवार के सदस्य भी स्वाभाविक रूप से अपने गांव से जुड़ेंगे, अपनी विरासत और संस्कृति से जुड़ेंगे और अपने पुरुखों से परिचित होंगे। इससे घोस्ट विलेज भी गुलजार होंगे।
सांसद बलूनी ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी वाइब्रेंट बॉर्डर विलेज और वेडिंग इन उत्तराखंड के जरिये पहाड़ को आबाद करने का बीड़ा उठाया है। तो क्या हम अपने निजी आयोजनों के लिए भी अपना गांव नहीं आ सकते हैं। अनिल बलूनी ने कहा कि मैंने पहाड़ और अपने निर्जन गाँवों को आबाद करने के उद्देश्य से इगास और अपना वोट, अपने गाँव जैसे कार्यक्रम शुरू किये जिससे जमीन पर अच्छा बदलाव आया है।
भाजपा सांसद ने ग्रामीणों से पहाड़ के कम होते राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर भी चर्चा की। उन्होंने कहा कि पहाड़ के गांवों को बचाना उत्तराखंड ही नहीं, बल्कि देश की सुरक्षा और यहाँ के राजनैतिक भविष्य के लिहाज से भी बेहद जरूरी है। हमारा सीमांत प्रदेश, चीन से सटा हुआ है। इस लिहाज से उच्च हिमालयी क्षेत्र के ग्रामीण, हमारे फुटसोल्जर सरीखे होते हैं। दूसरी वजह पहाड़ में निर्वाचन क्षेत्रों की लगातार घटती संख्या है। पौड़ी जिले में पहले आठ विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र होते थे, जो अब घटकर छह रह गए है। उन्हाेंने कहा कि
ऐसा भी हो सकता है कि आने वाले समय में केवल 4 या 5 विधानसभा रह जाए। इसी प्रकार चमोली जिले में 4 विधानसभा थी, आने वाले समय में 2 रह जाए। नैनीताल, पिथौरागढ़ में भी विधानसभा सीटें कम हो रही है। ये हम लोगों के लिए सोचने का विषय है। पहाड़ की आवाज उठाने के लिए पहाड़ को आबाद रखना बेहद जरूरी है।

