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केजरीवाल ने हाई कोर्ट में खुद दलीलें रखीं, जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा की बेंच पर लगाए कई गंभीर आरोप

नई दिल्ली, 13 अप्रैल । दिल्ली उच्च न्यायालय में सोमवार को पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने खुद दलीलें रखीं। उन्होंने जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा की बेंच पर सवाल उठाते हुए सुनवाई से हटने की मांग की।

दिल्ली आबकारी घोटाला मामले में सभी 23 आरोपितों को बरी करने के ट्रायल कोर्ट के आदेश को चुनौती देने वाली सीबीआई की याचिका पर आज सुनवाई के दौरान केजरीवाल ने कहा कि जिस तरह से अब तक इस मामले में अदालती कार्यवाही हुई है, उससे उन्हें निष्पक्ष न्याय की उम्मीद नहीं दिख रही है। केजरीवाल की अर्जी में 10 ऐसी दलीलें दी गई हैं, जो न केवल कानूनी हलकों में चर्चा का विषय बनी हुई हैं, बल्कि जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली और न्यायिक प्रक्रिया पर भी सवालिया निशान खड़ा करती हैं।

केजरीवाल ने जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा पर अविश्वास जताते हुए कहा कि 9 मार्च को जब उच्च न्यायालय में पहली सुनवाई हुई, तो वहां 23 में से एक भी आरोपित मौजूद नहीं था। कोर्ट में सिर्फ सीबीआई मौजूद थी, लेकिन जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने पहली ही सुनवाई में बिना दूसरे पक्ष की दलीलें सुने यह कह दिया कि ‘प्रथम दृष्टया’ सेशंस कोर्ट का आदेश गलत लगता है। बिना रिकॉर्ड मंगवाए और बिना दलीलें सुने कोर्ट इस नतीजे पर कैसे पहुंच गया।

केजरीवाल ने आरोप लगाते हुए कहा कि 9 मार्च को सीबीआई की अपील पर सुनवाई हो रही थी, लेकिन जस्टिस शर्मा ने ईडी की कार्यवाही पर भी रोक लगा दी। आरोपितों के मुताबिक, न तो केंद्र सरकार ने और न ही ईडी ने इसके लिए कोई प्रार्थना की थी। कानूनन, यदि मुख्य केस में अपराध साबित नहीं होता, तो ईडी का केस अपने आप कमजोर हो जाता है। सेशंस कोर्ट ने सीबीआई केस खत्म कर दिया था, जिससे ईडी का मामला भी खत्म होने वाला था, लेकिन जस्टिस शर्मा ने खुद से ही इस पर रोक लगा दी।

केजरीवाल ने कहा कि इस मामले को ‘पूर्व निर्धारित षड्यंत्र’ करार देते हुए सीबीआई के जांच अधिकारी के विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्यवाही का आदेश दिया था, लेकिन जस्टिस शर्मा ने इस कार्यवाही पर भी रोक लगा दी, जबकि संबंधित अधिकारी ने इसके लिए कोई आवेदन ही नहीं किया था। आरोपितों का कहना है कि यह ‘अस्वाभाविक’ सक्रियता शंका पैदा करती है।

केजरीवाल ने कोर्ट की टाइमिंग पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा आमतौर पर अन्य केसों में 3 से 7 महीने तक की तारीख देती हैं। लेकिन इस मामले में उन्होंने आरोपितों को जवाब दाखिल करने के लिए महज एक हफ्ते का समय दिया। 600 पन्नों के लंबे आदेश और सीबीआई की जटिल अपील का जवाब इतने कम समय में देना लगभग नामुमकिन है।

केजरीवाल ने अपनी अर्जी में कहा है कि जब पिछले साल पांच आरोपितों ने जमानत के लिए अर्जी लगाई थी, तब जस्टिस शर्मा ने जमानत खारिज करते हुए बहुत कठोर टिप्पणी की थी। कानूनन, बेल की स्टेज पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जाता, यह काम ट्रायल के बाद होता है लेकिन जस्टिस शर्मा ने अपने आदेश में उन्हें पहले ही ‘दोषी’ बता दिया, जो उनकी ‘पूर्व-निर्धारित राय’ को दर्शाता है।

केजरीवाल ने अर्जी में कहा है कि जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा द्वारा पारित किए गए इन सभी जमानत के आदेश को उच्चतम न्यायालय ने बाद में रद्द कर दिया था। न केवल आदेश रद्द हुए, बल्कि आरोपितों को जमानत भी मिली और उच्चतम न्यायालय ने जस्टिस शर्मा के रुख पर सख्त टिप्पणियां भी की। अर्जी में यह गंभीर आरोप भी लगाया गया है कि जस्टिस शर्मा सीबीआई और ईडी की दलीलों को अक्षरशः मान लेती हैं। यहां तक कि सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता द्वारा मौखिक रूप से कही गई बातों पर भी तुरंत आदेश पारित कर दिए जाते हैं। आरोपितों का कहना है कि एजेंसियों की हर मांग को मान लेने से न्याय की उम्मीद धूमिल हो जाती है।