Delhi

बढ़ेगी महंगाई, जमाखोर पैदा कर सकते हैं ‘कोढ़ में खाज’

संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) ने अपनी रिपोर्ट में दुनिया के बड़े हिस्सों में महंगाई बढ़ने की चेतावनी दी है। हमारा देश भी इससे अछूता नहीं रह सकता। जरूरत है कि लोग आवश्यकता से अधिक सामाग्री के उपभोग से बचें, तो जिम्मेदार एजेंसियां जीवनोपयोगी बस्तुओं की आपूर्ति सुचारू रखने के उपाय करें। अभी पिछले महीने खुदरा महंगाई दर मार्च वाली 3.4 प्रतिशत से बढ़कर 3.48 हुई, तो रिकॉर्ड किया गया कि यह एक वर्ष में सबसे अधिक है। उससे आम जनजीवन पर कितना असर हुआ, इस पर वाद-विवाद हो सकता है। वैसे इसे दो-तीन दिन पहले पैकेट वाले दूध के महंगा होने के तौर पर आसानी से समझा जा सकता है। आगे निश्चित ही इस पर दो राय नहीं है कि पेट्रोल-डीजल की बढ़ी कीमतें महंगाई को और ऊपर ले जाने वाली हैं।

कुछ ही दिन पहले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जब लोगों से सोना नहीं खरीदने, गाड़ियों का उपयोग कम करने, कार्यालयों को ‘वर्क फ्रॉम होम’ करने जैसे आह्वान किए, उसे आने वाले दिनों की तस्वीर समझा जाना चाहिए था। उनकी अपील सावधानी की तरह है, जिन पर अमल से कुछ हद तक राहत मिल सकती है। असल में यह स्थिति विश्व -बाजार के कारण सामने आई है। मध्य पूर्व संकट के बदलते हालात ने कच्चा तेल और अन्य ईंधन की आपूर्ति पर असर डाला है। संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम यानी यूएनडीपी ने भी अपनी ताजा रिपोर्ट में कहा है कि इससे एशिया-प्रशांत क्षेत्र में विकास की गति अधोगामी हो सकती है। अमेरिका-ईरान तनाव के बीच होर्मुज जलडमरूमध्य में बाधाएं ईंधन और परिवहन की लागत बढ़ा रही हैं। जहां तक अपने देश की बात है, थोक महंगाई 42 महीनों में सबसे अधिक बताई गई है। इसे देश के वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय ने भी स्वीकार किया है। वैश्विक बाजार में तेल की कीमतें 50 फीसदी बढ़ने के बावजूद अब तक हमारे यहां पेट्रोल, डीजल और घरेलू गैस के दाम स्थिर रखे गए थे। इससे आम लोगों तक महंगाई का असर सीधे महसूस नहीं किया गया।

महंगाई बढ़ने के कारक स्पष्ट हुआ करते हैं। ताजा मामला सभी की समझ में आएगा कि महंगा पेट्रोल, डीजल मुख्य रूप से ट्रांसपोर्ट सेवाओं और खाद्य सामग्री की आपूर्ति पर असर डालेंगे। इससे अधिक यात्राएं करने वाले और नौकरी आदि के लिए प्रतिदिन बाहर जाने वाले प्रभावित होंगे, तो घर की थाली भी असर पड़ने से बच नहीं पाएगी। और अधिक सरल ढंग से समझें तो जल्द ही पहले आम बसों और ऑटो आदि के किराया बढ़ेगा। हालात यही रहे तो भविष्य में सरकारी सार्वजनिक परिवहन भी बढ़ते परिचालन खर्च का भार अपने यात्रियों पर डाल सकते हैं। माल ढुलाई भाड़ा सीधे ही सब्जियां और गेहूं-चावल जैसे आम उपभोक्ता सामग्री तक लोगों की पहुंच को कठिन बनाने वाला है। शहरों में इसे सीधे महसूस किया जाएगा। ग्रामीण क्षेत्र कुछ कम असर वाले हो सकते हैं, पर खेती-बाड़ी को किसी भी हाल में अछूता नहीं रखा जा सकता। डीजल की मांग खेती के मौसम में अधिक हुआ करती है। आने वाले दिन ऐसे ही होंगे। स्वाभाविक है कि डीजल से चलने वाले खेती के उपकरण, ट्रैक्टर और सिंचाई के पंप की रफ्तार पर असर पड़ेगा। उर्वरकों के दाम बढ़ने शुरू हो ही चुके हैं।

इस तरह की महंगाई क्यों हुई, संचार माध्यमों ने लोगों को समझा दिया है। एक और बिंदु है, जिसे पहले से लोग जानते-समझते हैं। वह बिंदु जमाखोरी की है। महंगी होती सामग्री को जमाखोर इसलिए रोके रखते हैं कि उसकी किल्लत पैदा कर और उसे और महंगा किया जाय। घरेलू एलपीजी की जमाखोरी ज्वलंत उदाहरण है। कम होता ईंधन लोगों तक देर से पहुंच रहा है, तो इसका नाजायज फायदा जमाखोर उठा रहे हैं। यह अर्थ व्यवस्था में कोढ़ में खाज की तरह है। प्रशासनिक अमलों को इस ओर ध्यान देना होगा। सरकारों को चाहिए कि लोगों को उपभोक्ता सामग्री कम करने के लिए ही प्रेरित नहीं करें, साथ ही जीवनोपयोगी चीजें लोगों तक आसानी से पहुंचें, इसके भी उपाय करें।

(लेखक, वरिष्ठ पत्रकार हैं।)