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गुना स्कूल मामले में बाल आयोग सख्त, अध्यक्ष बोलीं- बच्चों के मन में लोकतंत्र और सरकार के खिलाफ जहर नहीं भरा जा सकता, एबीवीपी ने सौंपा ज्ञापन

भोपाल, 17 अक्टूबर । मध्य प्रदेश बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने गुना जिले के क्राइस्ट सीनियर सेकेंडरी स्कूल में कक्षा एक की नन्हीं छात्रा की फैंसी ड्रेस प्रस्तुति को गंभीरता से लेते हुए पूरे प्रकरण का संज्ञान लिया है। वहीं मामले को लेकर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (अभाविप) ने अपना विरोध दर्ज कराया और विद्यालय के प्रिंसिपल को ज्ञापन सौंपकर स्पष्टीकरण देने की मांग की।

पूरा प्रकरण 13 अक्टूबर का होना बताया जा रहा है। जहां विद्यालय फैंसी ड्रेस प्रस्तुति के माध्यम से लोकतंत्र को कमजोर एवं संविधानिक संस्थाओं खासकर सरकार को निशाना बनाया गया है और यही बताने का प्रयास हुआ है कि देश में केंद्र व राज्य स्तर पर सरकारों ने आम नागरिक के बोलने के अधिकार को छीन लिया है, देश में तानाशाही व्यवस्था लागू है।

अब इस पूरे मामले को मध्य प्रदेश बाल अधिकार संरक्षण आयोग की अध्यक्ष डॉ. निवेदिता शर्मा ने स्पष्ट कहा कि बच्चों के कोमल मन में अपने लोकतंत्र, संविधानिक संस्थाओं और सरकार के खिलाफ किसी भी तरह की भावना नहीं भरी जा सकती। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि शिक्षा के केंद्र यानी विद्यालयों में किसी भी बहाने से नफरत का पाठ पढ़ाने का प्रयास होगा तो नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी।

डॉ. शर्मा ने कहा, “शिक्षा का उद्देश्य यही है कि बच्चों को अच्छी शिक्षा मिले, वे देश के सफल नागरिक बनें, राज्य और देश का नाम विश्व भर में गौरवान्वित करें तथा उनका स्वयं का जीवन हर क्षेत्र में सफल हो। किंतु यदि स्कूलों में राजनीतिक संदेशों के माध्यम से छोटे बच्चों को इस्तेमाल किया जाएगा तो यह बाल अधिकारों का सीधा उल्लंघन है।” आयोग ने मामले की जांच के लिए संबंधित अधिकारियों को निर्देश जारी करने की बात कही है और स्कूल प्रबंधन, जिला शिक्षा विभाग तथा संबंधित पक्षों से विस्तृत रिपोर्ट तलब की है।

मंगलवार को गुना स्थित क्राइस्ट सीनियर सेकेंडरी स्कूल में कक्षा एक से पांचवीं तक के विद्यार्थियों के लिए फैंसी ड्रेस प्रतियोगिता आयोजित की गई थी। इसी दौरान कक्षा एक की एक छात्रा स्कूल यूनिफॉर्म में मंच पर पहुंची। उसके मुंह पर पट्टी बंधी हुई थी। हाथ में एक बड़ी तख्ती थी, जबकि पीठ पर दूसरी तख्ती लटकी हुई थी।

पीठ पर लटकी तख्ती पर और भी तीखा संदेश था, “लोकतंत्र को पाठशाला से निकाल दिया गया क्योंकि वह सवाल पूछता था।…” इस प्रस्तुति की तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुए। शहर के राजनीतिक और सामाजिक हलकों में बहस छिड़ गई कि क्या एक निजी स्कूल के सांस्कृतिक कार्यक्रम में इतनी छोटी उम्र की बच्ची के माध्यम से इतने तीखे राजनीतिक संदेश देना उचित है।

घटना की जानकारी मिलते ही अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (अभाविप) की गुना इकाई सक्रिय हो गई। परिषद के कार्यकर्ताओं ने स्कूल के प्राचार्य को ज्ञापन सौंपकर कड़ी आपत्ति दर्ज कराई। एबीवीपी का कहना था कि शैक्षणिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का उद्देश्य विद्यार्थियों की प्रतिभा, रचनात्मकता और व्यक्तित्व विकास को बढ़ावा देना होना चाहिए। ऐसे मंचों पर मासूम बच्चों के जरिए राजनीतिक संदेश का प्रदर्शन शैक्षणिक गरिमा के विपरीत है।

अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद का स्पष्ट मानना है कि बिना विद्यालय की अनुमति के इस तरह का स्टेज परफोरमेंस हो ही नहीं सकता, यदि यह हो भी रहा था तो क्यों नहीं विद्यालय प्रशासन ने इसे तुरंत रोकने का प्रयास किया? यदि प्रयास नहीं किया गया, तब यही माना जाएगा कि कहीं न कहीं विद्यालय प्रशासन का इस नकारात्मक प्रयास को अपना मौन समर्थन मिला हुआ था।

परिषद ने आयोजन प्रभारी और संबंधित शिक्षकों की भूमिका की निष्पक्ष जांच की मांग की। साथ ही जिला शिक्षा अधिकारी और बाल अधिकार संरक्षण आयोग को मामले की रिपोर्ट भेजने तथा स्कूल प्रबंधन का आधिकारिक रुख स्पष्ट करने की मांग रखी। अभाविप ने चेतावनी दी कि संतोषजनक कार्रवाई नहीं होने पर वह बाल अधिकार और शैक्षणिक प्राधिकरणों के समक्ष वैधानिक शिकायत दर्ज कराएगी।

वहीं, विवाद बढ़ते देख क्राइस्ट सीनियर सेकेंडरी स्कूल के प्राचार्य फादर बाबू थारायिल सीएमआई ने आधिकारिक स्पष्टीकरण जारी किया। प्रबंधन का कहना है कि छात्रा की वेशभूषा प्रतियोगिता के लिए तय दिशा-निर्देशों के अनुरूप नहीं थी। स्कूल का दावा है कि यह निर्णय पूरी तरह अभिभावकों का था और उन्होंने ही बच्ची को घर से तैयार करके भेजा था। प्रबंधन ने कार्यक्रम की प्रभारी शिक्षिका को कारण बताओ नोटिस जारी करने की जानकारी दी। स्कूल ने कहा कि भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए निगरानी बढ़ाई जाएगी।

इस पूरे प्रकरण से जुड़ी एक अन्य जानकारी के अनुसार फैंसी ड्रेस प्रतियोगिता में शामिल छात्रा शहर के एक वरिष्ठ कांग्रेस नेता की पोती बताई जा रही है, हालांकि इसकी स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध नहीं है। कांग्रेस जिलाध्यक्ष और राघौगढ़ विधायक जयवर्धन सिंह सहित कई वरिष्ठ कांग्रेस नेताओं ने छात्रा की वेशभूषा की तस्वीरें सोशल मीडिया पर साझा कीं। इन पोस्ट के जरिए भाजपा सरकार पर निशाना साधे जाने की बात सामने आई है। शहर के कुछ नागरिकों ने भी सवाल उठाए कि एक निजी स्कूल द्वारा इस तरह का प्रयास करना गलत है। उन्होंने पूछा कि यह आयोजन कराने वाले कौन लोग हैं और बच्चों को क्या सिखा रहे हैं।

मध्य प्रदेश बाल अधिकार संरक्षण आयोग के संज्ञान लेने के बाद अब पूरा मामला शिक्षा विभाग और बाल अधिकार प्राधिकरण की निगरानी में आ गया है। डॉ. निवेदिता शर्मा के बयान से स्पष्ट है कि आयोग छोटे बच्चों को राजनीतिक प्रचार का माध्यम बनाने के किसी भी प्रयास को बर्दाश्त नहीं करेगा।

इस संबंध में मनोवैज्ञानिक डॉ. अनुकंपा मिश्रा का कहना है कि कक्षा एक की उम्र में बच्चा अभी राजनीतिक मुद्दों की समझ रखने में सक्षम नहीं होता। ऐसे में अभिभावकों या किसी अन्य पक्ष द्वारा उसे तैयार करके मंच पर एक खास नैरेटिव को स्थापित करने के लिए लाना, जोकि सर्वस्वीकार्य न हो और जो उसके बाल मन पर गहरा एवं नकारात्मक प्रभावी डालने का काम करे, वास्तव में बाल मनोविज्ञान और बाल अधिकारों दोनों के खिलाफ है। स्कूल की जिम्मेदारी भी यही बनती है कि वह प्रतियोगिता में भाग लेने वाली पोशाकों की पूर्व समीक्षा करे। हर विषय के महत्व एवं उसकी गंभीरता के आधार पर उसका चयन बच्चों के हित को देखते हुए करे।

फिलहाल अभाविप जांच और जवाबदेही की मांग कर रहा है, स्कूल प्रबंधन प्रभारी शिक्षिका को नोटिस जारी करने की बात कह रहा है और बाल अधिकार आयोग पूरे प्रकरण की गहन जांच कर रहा है। अब यह देखना होगा कि शिक्षा विभाग और आयोग इस मामले में क्या कार्रवाई करते हैं तथा स्कूल अपनी समीक्षा में क्या निष्कर्ष निकालता है। इस पूरी घटना ने एक बार फिर इस सवाल को केंद्र में ला दिया है कि स्कूलों के सांस्कृतिक कार्यक्रमों में राजनीतिक संदेशों की कितनी जगह होनी चाहिए और बच्चों की कोमल उम्र को राजनीतिक हथियार बनाने से कैसे रोका जाए।