राजस्थान में तीन साल में सात बच्चे बोरवेल में गिरे, छह की मौत; 2026 में दो और हादसे, एक की गई जान
जयपुर, 04 नवंबर । राजस्थान में खुले और अनुपयोगी बोरवेल बच्चों की जिंदगी के लिए गंभीर खतरा बने हुए हैं। प्रदेश में पिछले तीन वर्षों के दौरान सात बच्चे बोरवेल में गिर गए, जिनमें छह की मौत हो गई, जबकि एक को सुरक्षित बचा लिया गया। इसके बाद वर्ष 2026 में भी दो बच्चे खुले बोरवेल में गिरने की घटनाएं सामने आईं। इनमें अलवर में एक बच्चे को सुरक्षित निकाल लिया गया, जबकि फलोदी में करीब 39 घंटे तक चले बचाव अभियान के बाद भी नौ वर्षीय बच्चे की जान नहीं बचाई जा सकी। इस तरह उपलब्ध इन घटनाओं में कुल नौ बच्चे बोरवेल में गिरे और सात की मौत हुई। चिंताजनक पहलू यह है कि ज्यादातर हादसे निजी कृषि भूमि पर हुए और बोरवेल खोदे जाने की जानकारी प्रशासन को नहीं थी। दूसरी ओर सरकार ने पिछले तीन वर्षों में 49 हजार 275 खुले बोरवेल और कुओं को ढकवाने दावा किया है।
ये तथ्य विधानसभा में बूंदी विधायक हरिमोहन शर्मा की ओर से पूछे गए सवाल के लिखित जवाब में सामने आए हैं। पंचायती राज विभाग ने सदन में पिछले तीन वर्षों के दौरान खुले बोरवेल में बच्चों के गिरने की सात घटनाओं का विवरण प्रस्तुत किया। इनमें दौसा और जयपुर में तीन-तीन तथा झालावाड़ में एक घटना हुई है। इन हादसों में छह बच्चों की मौत हुई, जबकि जयपुर की एक घटना में बच्चा सुरक्षित बच गया।
जिला-वार विवरण के अनुसार दौसा जिले के कालीखाड़, टोडा ठेकला और धाणी (खड़ब) क्षेत्र में तीन बच्चे खुले बोरवेल में गिर गए। तीनों की मौत हो गई। विभागीय जवाब में बताया गया कि ये बोरवेल निजी खातेदारी भूमि पर खोदे गए थे। इन मामलों में कार्रवाई अपेक्षित नहीं होने का उल्लेख किया गया है।
जयपुर जिले में वर्ष 2023-24 में जमवारामगढ़ पंचायत समिति की भोजपुरा कलां ग्राम पंचायत क्षेत्र में एक बच्चा बोरवेल में गिर गया था, जिसे सुरक्षित बचा लिया गया। इसके बाद वर्ष 2024-25 में कोटपूतली और सांगानेर पंचायत समिति क्षेत्रों में दो हादसे हुए, जिनमें दोनों बच्चों की मौत हो गई। विभागीय विवरण में इन मामलों में भी निजी भूमि पर बोरवेल खोदे जाने और प्रशासन को इसकी सूचना नहीं दिए जाने की बात सामने आई है।
झालावाड़ जिले में वर्ष 2025 में पंचायत समिति डग की ग्राम पंचायत हसनबादिया के पालड़ा क्षेत्र में हादसा हुआ। यहां एक किसान ने अपनी निजी कृषि भूमि पर सिंचाई के लिए बोरवेल खुदवाया था। विभाग के अनुसार इसकी जानकारी प्रशासन को न तो लिखित रूप में दी गई और न ही मौखिक रूप से। इस बोरवेल में गिरने से बच्चे की मौत हो गई।
विधानसभा में प्रस्तुत जवाब में सरकार ने खुले बोरवेल और कुओं को ढकवाने की कार्रवाई का भी विवरण दिया। पंचायती राज विभाग के अनुसार वर्ष 2022-23, 2023-24 और 2024-25 के दौरान प्रदेश की ग्राम पंचायतों में कुल 49 हजार 275 खुले बोरवेल और कुओं को ढकवाया गया। जिला-वार आंकड़ों में जालोर 6 हजार 882 के साथ पहले स्थान पर रहा। नागौर में 5 हजार 459, हनुमानगढ़ में 5 हजार 355, बाड़मेर में 5 हजार 103 और झुंझुनूं में 4 हजार 598 खुले बोरवेल और कुएं ढकवाए गए। जयपुर में 3 हजार 281, जोधपुर में 3 हजार 237 और अलवर में 1 हजार 960 स्थानों पर ऐसी कार्रवाई की गई। वहीं बांसवाड़ा और राजसमंद के लिए इस अवधि में कोई संख्या दर्ज नहीं की गई।
सरकार ने बोरवेल हादसों को रोकने के लिए सुरक्षा संबंधी दिशा-निर्देश भी जारी किए हैं। इनके तहत बोरवेल खुदवाने से कम से कम 45 दिन पहले संबंधित ग्राम पंचायत को लिखित सूचना देना अनिवार्य है। पंचायत समिति स्तर पर ड्रिलिंग रिग का पंजीकरण कराने और खोदे गए बोरवेल का ग्रामवार तथा पंचायतवार रिकॉर्ड तैयार करने के निर्देश दिए गए हैं। निर्माण के दौरान बोरवेल के चारों ओर सुरक्षा अवरोध लगाने, केसिंग पाइप पर मजबूत ढक्कन लगाने और उसके चारों ओर सीमेंट-कंक्रीट का प्लेटफॉर्म बनाने की व्यवस्था भी जरूरी है। पंप की मरम्मत के दौरान बोरवेल को खुला नहीं छोड़ा जा सकेगा। परित्यक्त बोरवेल को जमीन के स्तर तक मिट्टी से भरवाने और संबंधित एजेंसी से प्रमाणपत्र लेने की जिम्मेदारी ग्राम पंचायत को दी गई है। नियमों का उल्लंघन होने पर एनओसी रद्द करने, बोरवेल सील करने और जुर्माना लगाने का प्रावधान भी है।
विधानसभा में प्रस्तुत तीन वर्षों के आंकड़ों के बाद वर्ष 2026 में भी प्रदेश में दो बोरवेल हादसे हुए। 31 अगस्त को अलवर जिले के रामगढ़ क्षेत्र के बुटोली गांव में नौ वर्षीय भानू पतंग के पीछे दौड़ते समय खुले बोरवेल में गिर गया। वह करीब 48 फीट की गहराई पर फंस गया था। प्रशासन, पुलिस, एसडीआरएफ और एनडीआरएफ की टीमों ने लगभग पांच घंटे तक बचाव अभियान चलाकर उसे सुरक्षित बाहर निकाल लिया। यह बोरवेल लंबे समय से अनुपयोगी बताया गया था।
इसके बाद 15 अक्टूबर को फलोदी जिले की नौसर ग्राम पंचायत के पूनियों की ढाणी में नौ वर्षीय भोमाराम करीब एक हजार 50 फीट गहरे बोरवेल में गिर गया। घटना के समय उसके पिता खेत में खराब पानी की मोटर की मरम्मत करा रहे थे। बच्चा बोरवेल में करीब 640 फीट की गहराई पर फंसा था। बचाव अभियान के दौरान बोरवेल में फंसे पत्थर के कारण टीमों को काफी परेशानी हुई। प्रशासन, एसडीआरएफ और एनडीआरएफ की टीमों ने करीब 39 घंटे तक प्रयास किए। 17 अक्टूबर की सुबह बच्चे को बाहर निकाला गया, लेकिन अस्पताल में चिकित्सकों ने उसे मृत घोषित कर दिया।
विधानसभा में दिए गए जवाब और इसके बाद हुई घटनाओं को साथ रखकर देखें तो निजी भूमि पर खोदे गए और अनुपयोगी पड़े बोरवेल की निगरानी सबसे बड़ी चुनौती है। सरकारी आंकड़ों में हजारों खुले बोरवेल और कुओं को ढकवाने की कार्रवाई दर्ज है, लेकिन निजी खेतों में बिना सूचना के खोदे गए बोरवेल प्रशासन की निगरानी से बाहर रह जाते है। ऐसे में प्रशासन को पंचायत स्तर पर मॉनिटरिंग और पुख्ता करने की आवश्यकता है।


