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अलीगढ़ का ‘डॉक्टर डेथ’ पैरोल पर बाहर, निर्दोष साबित, राहुल गांधी का सुप्रीम कोर्ट में हस्तक्षेप!

डॉक्टर डेथ, जिनका असली नाम देवेंद्र शर्मा है, हाल ही में पैरोल जंप करके अपने पैतृक गांव पुरैनी, अलीगढ़ लौट आए थे। उनका यह गांव अतरौली-छर्रा मार्ग पर स्थित है। गांव में लौटने के बाद वे अपने पुरानी यादों में खो गए और लोगों से मिलने के लिए समय-समय पर आते रहे। देवेंद्र पर 125 से अधिक लोगों की किडनी निकालने, 50 से ज्यादा हत्याएं करने और इन हत्याओं के बाद शवों को हजारा नहर में फेंकने का गंभीर आरोप है। हालांकि, गांव के बुजुर्गों का कहना है कि देवेंद्र के संबंध गांववालों से अच्छे थे और उन्होंने कभी किसी को परेशान नहीं किया। लेकिन इस बीच, उन्होंने एक ऐसा बयान दिया था जिससे एक निर्दोष व्यक्ति श्यौराज सिंह को 21 साल पहले उम्रकैद की सजा मिली थी।

श्यौराज सिंह अलीगढ़ के दिलालपुर गांव के निवासी हैं। उनका नाम डॉक्टर डेथ के एक बयान के कारण गलत तरीके से हत्याओं में शामिल कर दिया गया था। श्यौराज ने बताया कि वे निर्दोष थे, लेकिन हरियाणा पुलिस ने उन्हें पकड़कर थर्ड डिग्री दी। उन्हें 2008 में फरीदाबाद कोर्ट ने उम्रकैद की सजा सुनाई। लेकिन, उनकी पत्नी सुनीता ने इस मामले को फिर से खंगालने के लिए कई प्रयास किए। उन्होंने यूपी की मुख्यमंत्री मायावती से भेंट की और राहुल गांधी की मदद भी हासिल की। अंततः, सुप्रीम कोर्ट ने उनके निर्दोष होने की पुष्टि की और उन्हें 2013 में बाइज्जत बरी कर दिया।

डॉक्टर डेथ का पुश्तैनी घर अब एक खंडहर में तब्दील हो चुका है। गांव में लोग उनके भले स्वभाव की बातें कर रहे हैं, जबकि उनका जुर्म कई मामलों में गंभीर है। महेंद्र सिंह, एक रिटायर्ड डाककर्मी, जिन्होंने देवेंद्र को अच्छी तरह से जाना है, बताते हैं कि पहले वे किसी भी प्रकार के आपराधिक कृत्य में लिप्त नहीं थे। हालाँकि, जब उनके ऊपर आरोप लगा तो गांव की छवि को बहुत नुकसान पहुँचा। वहीं, हजारा नहर का इतिहास भी बहुत रोचक है। यह नहर गंगा नदी के डैम से निकलती है और कई जिलों से गुज़रती है। इस नहर में मगरमच्छों की अधिकता है, जिसे लेकर स्थानीय लोग परेशान हैं।

इस पूरी स्थिति को देखते हुए यह साफ है कि डॉक्टर डेथ की गिरफतारी और श्यौराज सिंह की निर्दोषता का मामला न केवल कानूनी पहलुओं से जुड़ा हुआ है, बल्कि यह एक बड़े सामाजिक और मानवीय दृष्टिकोण को भी दर्शाता है। इस मनसे कड़ी में बल पूर्वक हासिल किए गए सबूत और राजनीतिक हस्तक्षेप ने इसे और भी जटिल बना दिया है। क्या इस तरह के मामले समाज में न्याय का सवाल खड़ा नहीं करते? ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि आगे चलकर न्याय प्रणाली इस तरह के मामलों में कैसे कार्य करती है।