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जिहाद की ज्वाला, मिशन की चाल: संघ का संकल्प, भारत की ढाल

भारत की आत्मा सहिष्णुता और समन्वय पर आधारित रही है। ‘एकम् सद्विप्रा बहुधा वदन्ति’ का उद्घोष ही इसका प्राण रहा। किंतु मध्यकाल में इस्लामी आक्रांताओं के साथ एक अमानवीय जिहाद नामक एक नई मानसिकता उतरी। जिसने तलवार और दमन से मंदिर ढहाए, विश्वविद्यालय जलाए और असंख्य जबरन धर्मांतरण कराए। अल-बरूनी से लेकर इब्नेबतूता तक विदेशी यात्रियों ने प्रमाणित किया कि यह आक्रमण केवल सत्ता की लालसा नहीं, बल्कि संस्कृति मिटाने का संकल्प था।

औपनिवेशिक काल में यही चुनौती एक नए रूप में लौटी। पुर्तगालियों का गोवा इन्क्विज़िशन हो या ब्रिटिश संरक्षण में पनपे मिशनरी विद्यालय, उद्देश्य वही रहा, भारत को उसकी जड़ों से काटना। विलियम कैरी और एलेक्जेंडर डफ ने शिक्षा और सेवा का आवरण ओढ़ कर भारतीय परंपरा को ‘अंधविश्वास’ और ‘बर्बरता’ कहकर बदनाम किया। यहां तक कि इतिहासकार स्टीफन नेफ ने भी स्वीकारा कि मिशनरियों का घोषित परोपकार अंततः धर्मांतरण का औजार ही था।

दरअसल, जिहाद और मिशन सतह पर भिन्न थे पर ध्येय समान था। एक ने मंदिर तोड़े, दूसरे ने उन्हें अंधविश्वास कहा। एक ने रक्त बहाया, दूसरे ने आत्मा चुराई। एक ने शारीरिक गुलामी थोपी, दूसरे ने मानसिक दासता। भारतीय चिंतकों ने इस दोहरी चुनौती को भली-भांति पहचाना। स्वामी विवेकानंद ने चेताया कि ‘विदेशी धर्म हमें हमारी आत्मा से काट देंगे।’ महात्मा गांधी ने कहा कि ‘मिशनरियों की सेवा आत्मा की चोरी है।’ राजगोपालाचारी ने धर्मांतरण को ‘राजनीतिक प्रश्न और सामाजिक एकता के लिए खतरा’ बताया।

संख्या का संहार : अस्मिता पर आघात

यह संकट केवल अतीत की कहानी नहीं, वर्तमान का भी यथार्थ है। वर्ष 1951 में मुसलमानों की संख्या थी 9.8 प्रतिशत, जो आज बढ़कर 14.2 प्रतिशत हो चुकी है। असम, बंगाल और बिहार की सीमावर्ती जिलों में हिंदू अब अल्पसंख्यक हो गए हैं। ईसाई समुदाय भी अप्राकृतिक रूप से बढ़ा। 1951 में इनकी कुल संख्या थी 80 लाख (2.3%), 2011 तक यह 2.78 करोड़ (2.8%) पहुंच गई। उत्तर-पूर्व इसका तीखा प्रमाण है, नागालैंड 90%, मिजोरम 87%, मेघालय 75%, और अरुणाचल में 1971 का 1% अब 30% से ऊपर है। हिंदू, जो कभी 85 फीसदी से अधिक थे, आज घटकर 79.8 प्रतिशत रह गए हैं। मुसलमान और ईसाई मिलकर अब 20 करोड़ से भी अधिक हैं, यानी स्वतंत्र भारत (1951) की आधी जनसंख्या से भी बड़ा समूह!

ये आंकड़े मात्र जनगणना नहीं, बल्कि राष्ट्र की आत्मा पर अंकित अलार्म हैं। जहां हिंदू घटा, वहां कट्टरपंथ, अलगाववाद और मिशनरी जाल बढ़ा। जहां हिंदू टूटा, वहां भारतीयता लुटी, अस्मिता झुकी और संस्कृति सिकुड़ी। यदि अब भी समाज संगठित न हुआ, तो यह संख्या का समीकरण, संस्कृति के समूल संहार का समीकरण बन जाएगा।

संघ का समाधान : संगठन और संस्कार

इसी संयुक्त चुनौती के बीच डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने यह गहरी अनुभूति प्राप्त की, कि भारत की रक्षा का उपाय केवल तलवार या सत्ता में नहीं, बल्कि समाज की आत्मिक शक्ति, अनुशासन और संगठन क्षमता में निहित है। उन्होंने देखा कि विदेशी आक्रांताओं ने भारतीयता को पराजित करने के लिए समाज की जड़ों पर प्रहार किया, अतः उत्तर भी जड़ों से ही निकलना चाहिए। वे समझ गए थे कि जब तक भारतीय समाज आत्महीन और विखंडित रहेगा, तब तक वह विदेशी विचारधाराओं के सामने टिक नहीं पाएगा। इसलिए 1925 की विजयादशमी को उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की। यह कोई सामान्य संगठन नहीं था, बल्कि एक सांस्कृतिक संकल्प, आत्मा-जागरण का यज्ञ और राष्ट्र की चेतना का नवोत्थान था।

संघ का सबसे बड़ा प्रत्युत्तर उसकी शाखा बनी। खुले मैदान में लगने वाली यह साधारण-सी सभा वस्तुतः एक जीवंत प्रयोगशाला थी। वहां खेलों से शरीर सबल होता, व्यायाम से मन अनुशासित होता और प्रार्थना से आत्मा संस्कारित होती। “नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे” केवल गीत नहीं, बल्कि मातृभूमि के प्रति जीवन-समर्पण का उद्घोष था। डॉ. हेडगेवार कहा करते थे कि “मुठ्ठीभर संगठित लोग भी पूरे समाज में चेतना का संचार कर सकते हैं।” यही विश्वास आगे चलकर सत्य सिद्ध हुआ। शाखाओं से निकले स्वयंसेवक ग्राम-ग्राम और नगर-नगर में समाज को संगठित करने लगे।

जहां मिशनरियों ने सेवा और शिक्षा को धर्मांतरण का साधन बनाया, वहीं संघ ने इन्हीं माध्यमों को भारतीय आत्मा से जोड़ा। वनवासी कल्याण आश्रम इसका सजीव उदाहरण है। इस संगठन ने आदिवासी समाज को उसकी संस्कृति से काटने के बजाय उसके गौरव की रक्षा की। वहां सेवा का अर्थ किसी को धर्म बदलवाना नहीं, बल्कि उसकी आत्मा और स्वाभिमान को सुदृढ़ करना था। आज सेवा भारती, विवेकानंद केंद्र और एकल विद्यालय जैसे संगठन शिक्षा, स्वास्थ्य, ग्राम विकास और आपदा प्रबंधन में सक्रिय हैं। इनसे करोड़ों लोग लाभान्वित हुए हैं, बिना किसी धर्मांतरण की शर्त के। यही संघ की सेवा और मिशनरी सेवा के बीच का मूलभूत अंतर है।

संघ का सबसे बड़ा योगदान यही रहा कि उसने भारतीय समाज को आत्मगौरव लौटाया। सदियों तक अपमान सहने के बाद जब समाज हीनभावना से ग्रस्त हो चुका था, तब संघ ने यह विश्वास जगाया कि भारत केवल राजनीतिक राष्ट्र नहीं, बल्कि सांस्कृतिक राष्ट्र है। डॉ. हेडगेवार ने स्पष्ट कहा था कि “कांग्रेस की लड़ाई सत्ता परिवर्तन की है, हमारी लड़ाई समाज परिवर्तन की है।” इसी कारण संघ ने राजनीति की क्षणभंगुरता से दूरी बनाकर संस्कृति और संगठन को केंद्र में रखा।

आधुनिक संदर्भ और प्रासंगिकता

आज जब दुनिया एक वैश्विक गांव बन चुकी है, तब चुनौतियां भी सीमाओं से आगे बढ़ चुकी हैं। जिहाद अब आतंकवाद, अलगाववाद और ऑनलाइन कट्टरपंथ के रूप में है, जबकि मिशनरी गतिविधियां एनजीओ, विदेशी फंडिंग और डिजिटल परोपकार की आड़ में अधिक संगठित हो चुकी हैं। यह आक्रमण तलवार की चमक जितना प्रत्यक्ष नहीं, किंतु उससे कहीं अधिक गहरा और कपटी है क्योंकि यह सीधे आत्मा और चेतना पर प्रहार करता है।

ऐसे समय में संघ का उत्तर और भी प्रासंगिक है। डॉ. हेडगेवार का वह सूत्र कि ‘संगठन और संस्कार’ आज भी उतना ही जीवन्त है। एकल विद्यालयों से नई पीढ़ी को जड़ों से जोड़ा जा रहा है, ग्राम विकास योजनाओं से आत्मनिर्भरता की चेतना जगाई जा रही है, स्वदेशी अभियानों से आर्थिक स्वाभिमान सुदृढ़ हो रहा है और सांस्कृतिक नवजागरण कार्यक्रमों से भारत की आत्मा को नए युग के अनुरूप सुसज्जित किया जा रहा है। संघ की दृष्टि यही है कि किसी भी विदेशी विचारधारा का मुकाबला शस्त्रों से नहीं, बल्कि संस्कारों से किया जाए। जब समाज अनुशासित, संगठित और आत्मबल से परिपूर्ण होगा, तब न आतंकवाद उसे डरा सकेगा, न मिशनरी प्रलोभन बहका पाएंगे।

आज की परिस्थितियों में यह स्मरण आवश्यक है कि भारत की शक्ति केवल उसकी राजनीति या सैन्य शक्ति में नहीं, बल्कि उसकी संस्कृति, समाज और आत्मा में है। यदि समाज संगठित रहेगा, आत्मगौरव से सम्पन्न रहेगा और अपने गौरवशाली अतीत से प्रेरणा लेता रहेगा, तो जिहाद और मिशन जैसे हर आक्रमण निष्फल सिद्ध होंगे। किंतु यदि समाज आत्महीन, विखंडित और दिशाहीन हुआ, तो कोई भी विदेशी शक्ति भीतर से भारत को दुर्बल कर सकती है। इसीलिए डॉ. हेडगेवार का यह संदेश आज भी गूंजता है कि “सच्चा स्वराज तभी संभव है, जब प्रत्येक भारतीय के हृदय में राष्ट्र पहले और स्वयं बाद में हो।”

यह संदेश केवल नारा नहीं, बल्कि राष्ट्र-जीवन का शाश्वत सूत्र है। यही सूत्र भारत को बार-बार आत्मविस्मृति से उबारता रहा है और आगे भी उबारता रहेगा। यही वह मंत्र है जो भारतीय समाज को संगठित कर उसकी आत्मा को अभेद्य कवच प्रदान करता है।

(लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)