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सबरीमाला मामले में सांप्रदायिक प्रथाएं न्यायिक जांच का विषय : सुप्रीम कोर्ट

नई दिल्ली, 17 अप्रैल । सबरीमाला मंदिर मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी संप्रदाय की प्रथाएं न्यायिक जांच का विषय हो सकती हैं। चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली नौ सदस्यीय संविधान बेंच ने कहा कि आस्था से जुड़े मामलों पर फैसला सुनाते समय जजों को अपने निजी धार्मिक विश्वासों से ऊपर उठना चाहिए और अंतरात्मा की स्वतंत्रता तथा व्यापक संवैधानिक ढांचे से निर्देशित होना चाहिए।

आज सुनवाई के दौरान आत्मार्थम ट्रस्ट की ओर से पेश वकील एमआर वेंकटेश ने संप्रदाय शब्द की व्याख्या को चुनौती देते हुए कहा कि यह शब्द विदेशी मूल का है और भारतीय संदर्भ में इसकी अपनी सीमाएं हैं। उन्होंने कहा कि गैर-साप्रदायिक मंदिरों के अधिकारों को भी समान सुरक्षा दी जानी चाहिए। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ वकील राजीव धवन ने कहा कि एक व्यापक संवैधानिक रवैया अपनाने की जरुरत बताई। उन्होंने कहा कि कोर्ट को एक संतुलित फैसला देना चाहिए जो सभी धर्मों के अधिकारों को ध्यान में रखे। उन्होंने कहा कि आस्था या विश्वास समय के साथ बदलते रहते हैं। यह बदलाव सिर्फ किसी कानून के बन जाने से नहीं आता, बल्कि लोगों के बीच से ही उभरकर आता है।

इसके पहले 15 अप्रैल को मंदिर का प्रबंधन देखने वाले त्रावणकोर देवस्वोम बोर्ड की ओर से वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा था कि कोर्ट का काम आस्था की सत्यता की जांच करना नहीं है। सिंघवी ने संविधान के अनुच्छेद 25 का हवाला देते हुए कहा कि धर्म केवल व्यक्तिगत आस्था का विषय नहीं है बल्कि यह समान पहचान रखने वाले लोगों के समूह, संप्रदाय या पंथ की मान्यताओं और परंपराओं का समुच्चय है। उन्होंने कहा कि संविधान का अनुच्छेद 25 हर व्यक्ति को अपना धर्म मानने, पालन करने और प्रचार करने का अधिकार देता है। लेकिन यह अधिकार इतना व्यापक नहीं हो सकता कि उसी धर्म या संप्रदाय के बाकी अनुयायियों के सामूहिक अधिकारों का हनन होने लगे।

इस मामले में केंद्र सरकार ने कहा है कि 2018 का फैसला महिलाओं को पुरुषों से कमतर मानने की धारणा पर आधारित था। 9 अप्रैल को केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा था कि ये मामला किसी एक लिंग के पक्ष का विपक्ष का नहीं है बल्कि ये धार्मिक परंपराओं और आस्थाओं से जुड़ा हुआ है। मेहता ने कहा था कि देश में कई ऐसे मंदिर हैं जहां पुरुषों के प्रवेश पर भी प्रतिबंध है या उन्हें विशेष परंपराओं का पालन करना पड़ता है। उन्होंने कहा कि केरल के कोट्टनकुलंगरा श्री देवी मंदिर में पुरुष पारंपरिक रुप से महिलाओं की तरह साड़ी पहनकर पूजा करते हैं। ये परंपरा वर्षों से चली आ रही है। मेहता ने कहा था कि हर धार्मिक स्थल की अपनी अलग परंपराएं होती हैं, जिन्हें एक ही नजरिये से नहीं देखा जा सकता है।

सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की संविधान बेंच ने इस मामले पर 7 अप्रैल से सुनवाई शुरु की थी। बता दें की चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली इस बेंच में जस्टिस बीवी नागरत्ना, जस्टिस एमएम सुंदरेश, जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, जस्टिस अरविंद कुमार, जस्टिस एजे मसीह, जस्टिस पीबी वराले, जस्टिस आर महादेवन और जस्टिस जॉयमाल्या बागची शामिल हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने 28 सितंबर 2018 को 4-1 के बहुमत से फैसला सुनाया था । कोर्ट ने कहा था कि महिलाओं के साथ काफी समय से भेदभाव होता रहा है। महिला पुरुष से कमतर नहीं है। एक तरफ हम महिलाओं को देवी स्वरुप मानते हैं दूसरी तरफ हम उनसे भेदभाव करते हैं। कोर्ट ने कहा था कि बायोलॉजिकल और फिजियोलॉजिकल वजहों से महिलाओं के धार्मिक विश्वास की स्वतंत्रता को खत्म नहीं किया जा सकता है।