राजधानी भोपाल के मौजूदा ट्रांसमिशन कॉरिडोर में ही बढ़ेगी विद्युत पारेषण क्षमता : ऊर्जा मंत्री तोमर
भोपाल, 13 अक्टूबर । मध्य प्रदेश के ऊर्जा मंत्री प्रद्युम्न सिंह तोमर ने मंगलवार को बताया कि एमपी पावर ट्रांसमिशन कंपनी (एमपी ट्रांसको) भोपाल शहर की बढ़ती विद्युत मांग के अनुरूप पारेषण व्यवस्था को सक्षम बनाने के लिए एचटीएलएस (हाई टेम्परेचर लो सैग) कंडक्टर तकनीक से ट्रांसमिशन लाइनों की क्षमता बढ़ा रही है।
उन्होंने कहा कि मध्य प्रदेश में पहली बार इसी तकनीक का उपयोग 400 केवी सबस्टेशन सुखी सेवनिया से 220 केवी सबस्टेशन गोविंदपुरा भोपाल तक की ट्रांसमिशन लाइन में किया गया था। इस लाइन में पारंपरिक जेबरा कंडक्टर को एचटीएलएस कंडक्टर से बदलने से भोपाल शहर की पारेषण व्यवस्था को लाभ मिला है। अब भोपाल से अमरावद खुर्द तक के महत्वपूर्ण पारेषण सर्किट की क्षमता उन्नयन का कार्य भी किया जा रहा है।
ऊर्जा मंत्री तोमर ने एक बयान में कहा कि राजधानी भोपाल में विद्युत मांग बढ़ने के साथ मौजूदा पारेषण नेटवर्क की क्षमता बढ़ाना आवश्यक है। घनी आबादी वाले क्षेत्रों में नई ट्रांसमिशन लाइन के लिए कॉरिडोर विकसित करने और राइट ऑफ वे (आरओडब्ल्यू) प्राप्त करने में व्यावहारिक कठिनाइयां आती हैं। ऐसे में मौजूदा लाइन कॉरिडोर का उपयोग करते हुए एचटीएलएस तकनीक से पारेषण क्षमता बढ़ाना एक उपयोगी विकल्प है।
उन्होंने बताया कि एमपी ट्रांसको द्वारा 132 केवी डीसीडीएस भोपाल–अमरावद खुर्द लाइन के सर्किट में मौजूदा एसीएसआर पैंथर कंडक्टर को समतुल्य एचटीएलएस कंडक्टर से बदलने का कार्य किया जा रहा है। इसके साथ ही 132 केवी सबस्टेशन अमरावद खुर्द, 132 केवी सबस्टेशन मैनिट और 220 केवी सबस्टेशन भोपाल में संबंधित 132 केवी फीडर बे की क्षमता का भी उन्नयन किया जा रहा है। इससे लाइन और सबस्टेशन के संबंधित हिस्सों को बढ़ी हुई पारेषण क्षमता के अनुरूप सक्षम बनाने में मदद मिलेगी।
अमरावद खुर्द और मैनिट की विद्युत आपूर्ति के प्रबंधन में भी लाभ
मंत्री तोमर ने कहा कि भोपाल की पारेषण व्यवस्था में एचटीएलएस तकनीक के उपयोग से अमरावद खुर्द और मैनिट सब स्टेशन से संबंधित विद्युत आपूर्ति के प्रबंधन को भी लाभ मिलेगा।
उन्होंने कहा कि एचटीएलएस कंडक्टर उच्च तापमान पर भी अपेक्षाकृत कम सैग के साथ अधिक करंट वहन करने में सक्षम होते हैं। इससे मौजूदा ट्रांसमिशन कॉरिडोर का बेहतर उपयोग करते हुए पारेषण क्षमता बढ़ाई जा सकती है और नई लाइन के लिए अलग कॉरिडोर विकसित करने की आवश्यकता कम हो सकती है।


