(लीड) नई पीढ़ी अपनी जड़ों, भाषा और शास्त्रीय परंपराओं से जुड़े : निर्मला सीतारमण
वाराणसी, 03 नवंबर । केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा कि नई पीढ़ी को अपनी जड़ों, भाषा और शास्त्रीय परंपराओं की ओर लौटना चाहिए। भारत की विविधता और एकता को बनाए रखने के लिए अपनी सांस्कृतिक विरासत को समझना और उसे अगली पीढ़ी तक पहुंचाना बेहद जरूरी है। उन्होंने युवाओं और विद्यार्थियों से भारतीय शास्त्रीय संगीत की गहराइयों को समझने तथा देश की गौरवशाली परंपराओं को सहेजने का आह्वान किया।
केंद्रीय वित्त मंत्री मंगलवार को काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के स्वतंत्रता भवन सभागार में कर्नाटक संगीत के महान संगीतकार मुत्तुस्वामी दीक्षितर की 250वीं जयंती पर आयोजित समारोह को संबोधित कर रही थीं। इस अवसर पर उन्होंने महान संगीतकार के सम्मान में 250 रुपये के स्मारक सिक्के का लोकार्पण किया। कार्यक्रम का आयोजन आईआईटी बीएचयू के भारतीय ज्ञान परंपरा उत्कृष्टता केंद्र (सीओई-आईकेएस) की ओर से किया गया। वित्त मंत्री ने बीएचयू के कुलपति प्रो. अजित कुमार चतुर्वेदी के साथ दीप प्रज्ज्वलित कर समारोह का शुभारंभ किया।
निर्मला सीतारमण ने मुत्तुस्वामी दीक्षितर की संगीत रचनाओं की विशिष्टता, आध्यात्मिकता और विद्वत्ता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि उनकी कृतियां केवल संगीत रचनाएं नहीं हैं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक और भौगोलिक विरासत का विस्तृत परिचय भी कराती हैं। उन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से देश के विभिन्न तीर्थस्थलों और मंदिरों की विशेषताओं को स्वर दिया।
काशी का उल्लेख करते हुए वित्त मंत्री ने कहा कि दीक्षितर ने देवी की स्तुति में काशी विश्वलक्ष्मी का वर्णन किया है। उनकी रचनाओं में मंदिरों के पवित्र वृक्षों (स्थलवृक्ष), आसपास की नदियों, पर्वतों और भौगोलिक विशेषताओं का भी उल्लेख मिलता है। इस लिहाज से उनकी कृतियां किसी स्थान की सांस्कृतिक पहचान और ऐतिहासिक विशेषताओं को समझने का महत्वपूर्ण माध्यम हैं।
वित्त मंत्री ने मुत्तुस्वामी दीक्षितर की रचनाओं की तुलना प्रसिद्ध यात्रा-पुस्तक श्रृंखला ‘लोनली प्लैनेट’ से की। उन्होंने कहा कि आज किसी अनजान स्थान के बारे में जानकारी हासिल करने के लिए लोग गूगल का सहारा लेते हैं, जबकि पहले यात्री ‘लोनली प्लैनेट’ जैसी पुस्तकों के माध्यम से किसी स्थान के दर्शनीय स्थलों, खानपान और विशेषताओं की जानकारी प्राप्त करते थे।
उन्होंने कहा कि दीक्षितर की रचनाएं भी इसी तरह भारत के विभिन्न स्थानों, मंदिरों और उनकी विशिष्टताओं से परिचित कराती हैं। महान चित्रकारों की तरह वे अपनी प्रत्येक रचना में अपनी विशिष्ट पहचान छोड़ते थे। वे अपनी कृतियों में ‘गुरुगुह’ नाम की मुद्रा का प्रयोग करते थे और राग का नाम भी रचना में समाहित करते थे।
संगीत वाद्ययंत्रों की महत्ता पर चर्चा करते हुए निर्मला सीतारमण ने कहा कि प्रत्येक वाद्ययंत्र की संगीत जगत में अपनी अलग पहचान और विशिष्टता है। वायलिन, बांसुरी, सारंगी और वीणा जैसे वाद्ययंत्र अपनी अलग-अलग ध्वनि और भावनात्मक अभिव्यक्ति के लिए जाने जाते हैं। कुछ वाद्ययंत्रों की धुन सीधे मनुष्य की आत्मा को छूती है।
उन्होंने दक्षिण भारतीय कर्नाटक संगीत की वीणा और उत्तर भारतीय हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की सारंगी का विशेष उल्लेख किया। बांसुरी के संदर्भ में भगवान श्रीकृष्ण का स्मरण करते हुए उन्होंने कहा कि इसकी मधुर धुन भी मनुष्य को आध्यात्मिक अनुभूति करा सकती है। संगीत के प्रति प्रत्येक व्यक्ति का अपना भावनात्मक जुड़ाव और अनुभव होता है। उन्होंने वीणा को भारत का अत्यंत प्राचीन वाद्ययंत्र बताते हुए कहा कि इसकी ध्वनि मन को गहराई तक प्रभावित करती है।
वित्त मंत्री ने कहा कि मुत्तुस्वामी दीक्षितर केवल महान संगीतकार ही नहीं, बल्कि उच्च कोटि के विद्वान भी थे। कर्नाटक संगीत की त्रिमूर्ति में उनकी विशिष्ट पहचान है। उनकी रचनाओं में शब्दों का चयन और उनके अर्थ विशेष महत्व रखते हैं। उन्होंने कहा कि दीक्षितर की रचनाएं संस्कृत के सामान्य शब्दों का समूह मात्र नहीं हैं, बल्कि एक माला में पिरोए गए सुंदर फूलों की तरह हैं। प्रत्येक शब्द और उसका अर्थ संगीत की सुंदरता, गहराई और आध्यात्मिकता को समृद्ध करता है।
सांस्कृतिक आयोजनों में स्कूली बच्चों की भागीदारी की सराहना करते हुए उन्होंने कहा कि बच्चों को बचपन से ही भारत की समृद्ध संस्कृति, परंपराओं और विरासत से परिचित कराना चाहिए। विद्यार्थियों और युवाओं में भारतीय शास्त्रीय संगीत की गहराई समझने के साथ अपनी भाषाओं और सांस्कृतिक मूल्यों के प्रति सम्मान की भावना विकसित करना जरूरी है।
निर्मला सीतारमण ने काशी को ज्ञान और आध्यात्मिकता का महत्वपूर्ण केंद्र बताते हुए कहा कि यहां रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति का दायित्व है कि वह भारत की गौरवशाली सांस्कृतिक परंपराओं को जीवित रखे। उन्होंने कहा कि अपनी जड़ों, भाषा और शास्त्रीय परंपराओं को पहचानना तथा उन्हें संजोकर रखना नई पीढ़ी की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है।


