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आईवीआरआई में कार्यशाला, हिमाचल के 326 पशु चिकित्सक जुड़े

मुख्य अतिथि डॉ. संजीव कुमार धीमन, निदेशक पशुपालन विभाग, शिमला ने कहा कि इस तरह की कार्यशालाएं अनुसंधान संस्थानों और फील्ड स्तर के चिकित्सकों के बीच की खाई को पाटने में सहायक हैं। उन्होंने कहा कि खुरपका-मुंहपका, अफ्रीकन स्वाइन फीवर और पीपीआर जैसे रोगों से भारी आर्थिक नुकसान होता है। इनकी रोकथाम व शीघ्र पहचान में आईवीआरआई की तकनीकें कारगर साबित हो रही हैं।

आईवीआरआई निदेशक डॉ. त्रिवेणी दत्त ने बताया कि संस्थान ने अपने 135 वर्ष के इतिहास में कई महत्वपूर्ण उपलब्धियां हासिल की हैं। अब तक 13 टीके और 47 प्रौद्योगिकियां विकसित कर 163 उद्योगों को हस्तांतरित की गई हैं। इसके अलावा 64 आईसीटी टूल्स विकसित किए गए हैं, जिनका उपयोग 134 देशों में लाखों लोग कर रहे हैं।

संयुक्त निदेशक (प्रसार शिक्षा) डॉ. रूपसी तिवारी ने बताया कि पिछली बैठक में चिन्हित क्षेत्रों पर संस्थान ने गंभीरता से कार्य किया है। प्रतिभागियों ने हीमोप्रोटोजून रोगों के निदान किट, परजीवी रोगों के टीके, मुंह से दिए जाने योग्य टीकाकरण तकनीक, गर्भवती पशुओं पर एफएमडी टीकाकरण के असर समेत कई मुद्दे उठाए।

दो तकनीकी सत्रों में विशेषज्ञों ने छोटे जुगाली पशुओं के रोग, बांझपन प्रबंधन, परजीवी रोग नियंत्रण, पोल्ट्री प्रबंधन आदि पर व्याख्यान दिए। अंत में वैज्ञानिकों ने प्रतिभागियों के प्रश्नों के उत्तर भी दिए।

कार्यक्रम का संचालन डॉ. अखिलेश कुमार और धन्यवाद ज्ञापन डॉ. अजयता रियालच ने किया। इस मौके पर आईवीआरआई के वरिष्ठ वैज्ञानिक और पालमपुर, मुक्तेश्वर, बंगलूरू व कोलकाता केंद्रों के अधिकारी मौजूद रहे।