Rajasthan

पांच सौ ग्राम के प्रीटर्म नवजात ने जीती जिंदगी की जंग, सौ दिन बाद मां की गोद में लौटा

अजमेर, 08 अप्रैल। मित्तल हॉस्पिटल एंड रिसर्च सेंटर, अजमेर में चिकित्सा क्षेत्र की एक उल्लेखनीय सफलता सामने आई है। यहां 8 जनवरी 2026 को मात्र पांच माह (प्रीटर्म) में जन्मे पांच सौ ग्राम वजन के अत्यंत नाजुक नवजात शिशु को चिकित्सकों और नर्सिंग स्टाफ के समर्पित प्रयासों से सौ दिन बाद सुरक्षित उसकी मां की गोद में सौंपा गया। डिस्चार्ज के समय शिशु का वजन बढ़कर 1700 ग्राम हो गया।

इस जटिल उपचार में नियोनेटोलॉजिस्ट डॉ रोमेश गौतम, गायनेकोलॉजिस्ट डॉ प्रीतम कोठारी, शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ प्रशांत माथुर, डॉ प्रीति गर्ग तथा एनआईसीयू प्रभारी सिस्टर स्वर्णलता एंड्रयूज सहित पूरी टीम की महत्वपूर्ण भूमिका रही।

डॉ रोमेश गौतम ने बताया कि जन्म के समय शिशु के फेफड़े, मस्तिष्क और आंतें पूरी तरह विकसित नहीं थीं और उसका आकार हथेली से भी छोटा था। उसे रेस्पिरेटरी डिस्ट्रेस सिंड्रोम (आरडीएस) से बचाने के लिए सर्फेक्टेंट थेरेपी दी गई, जिससे फेफड़ों की कार्यक्षमता में सुधार हुआ। उपचार के शुरुआती 20 से 22 दिनों में उसका वजन घटकर 450 ग्राम तक पहुंच गया था, लेकिन बाद में धीरे धीरे सुधार हुआ और एक माह में उसने दूध पचाना शुरू कर दिया।

उन्होंने बताया कि ऐसे शिशुओं के उपचार में केवल जीवित रखना ही लक्ष्य नहीं होता, बल्कि उनके सभी अंगों,आंख, मस्तिष्क, हृदय और फेफड़ों का समुचित विकास सुनिश्चित करना भी आवश्यक होता है। इसके लिए नियमित जांच और सतत निगरानी की जाती है।

उपचार के दौरान संक्रमण से बचाव के लिए शिशु को नियंत्रित और सुरक्षित वातावरण में रखा गया तथा 24 घंटे एक चिकित्सक और नर्सिंग स्टाफ की विशेष निगरानी में रखा गया। ऐसे नवजात यदि देश के बड़े से बड़े चिकित्सा संस्थान में पैदा हों तो भी वहां की जीवन रक्षा दर 20 प्रतिशत से ज्यादा नहीं है। ऐसी स्थिति में जन्में बच्चे पर वहां आने वाला खर्च भी सामान्य रूप से देखा जाए तो कम से कम 25 लाख रुपए से ज्यादा ही आता है। नवजात को वैसा ही उपयुक्त वातावरण मित्तल हॉस्पिटल में उपलब्ध कराया गया।

गायनेकोलॉजिस्ट डॉ प्रीतम कोठारी ने बताया कि प्रसूता की स्थिति भी प्रारंभ में अत्यंत गंभीर थी, जिसमें मां और शिशु दोनों के जीवन को खतरा था। समय पर लिए गए चिकित्सकीय निर्णय और सर्जरी से दोनों की जान बचाई जा सकी। शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ प्रीति गर्ग ने कहा कि ऐसे मामलों में चिकित्सकीय टीम के साथ.साथ परिवार का धैर्य और सहयोग भी अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। इस मामले में परिजनों ने पूरा सहयोग दिया जिससे उपचार सफल हो सका। नवजात शिशु के आगे के जीवन के लिए उसकी मां को पूरी तरह से प्रशिक्षित कर दिया गया।