सत्ता परिवर्तन नहीं, व्यवस्था और मानसिकता में बदलाव से ही होगा वास्तविक परिवर्तन : के.एन. गोविंदाचार्य
नई दिल्ली, 26 जून । राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के पूर्व वरिष्ठ प्रचारक एवं राजनीतिक-सामाजिक विचारक के.एन. गोविंदाचार्य ने कहा है कि केवल सत्ता परिवर्तन से किसी आंदोलन का उद्देश्य पूरा नहीं होता। जब तक व्यवस्था और समाज की मानसिकता में परिवर्तन नहीं आता, तब तक वास्तविक बदलाव संभव नहीं है। उन्होंने कहा कि अतीत के अनुभवों से सीख लेकर भविष्य की चुनौतियों के अनुरूप नए विचार, नई कार्यप्रणाली और नए नेतृत्व का निर्माण करना समय की आवश्यकता है।
गोविंदाचार्य शुक्रवार को दिल्ली स्थित इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (आईजीएनसीए) में ‘प्रज्ञा जिज्ञासा’ की ओर से आपातकाल के 50 वर्ष पूरे होने के अवसर पर आयोजित ‘संवाद : इमरजेंसी के सबक’ कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे। कार्यक्रम के दौरान वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक अजय सेतिया की पुस्तक ‘आपातकाल : आंदोलन और विश्वासघात की अंतर्कथा’ का लोकार्पण भी किया गया।
अपने संबोधन में गोविंदाचार्य ने आपातकाल के दौर का उल्लेख करते हुए कहा कि जब आंदोलनकारी समाज में पूरी तरह घुल-मिल जाते हैं, तब सत्ता की दमनकारी शक्तियां भी उन्हें खोज नहीं पातीं। उन्होंने कहा कि आपातकाल के दौरान भी यही स्थिति देखने को मिली थी। उनके अनुसार, सामाजिक आंदोलनों की सफलता केवल राजनीतिक परिवर्तन से नहीं, बल्कि समाज की व्यापक भागीदारी और वैचारिक परिवर्तन से सुनिश्चित होती है।
उन्होंने कहा कि वर्तमान समय की चुनौतियों का सामना करने के लिए नए योद्धा, नया संगठनात्मक ढांचा, नए तरीके और आधुनिक औजार अपनाने होंगे। साथ ही रचनात्मकता, आंदोलनात्मकता और बौद्धिकता का समन्वय आवश्यक है। इन तीनों के संतुलित समावेश से ही समाज और राष्ट्र की वास्तविक प्रगति का मार्ग प्रशस्त होगा।
गोविंदाचार्य ने लोकनायक जयप्रकाश नारायण (जेपी) के आंदोलन के दौरान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तत्कालीन सरसंघचालक बाला साहब देवरस के साथ हुई चर्चा का उल्लेख करते हुए कहा कि किसी भी संगठन या व्यक्ति से ऊपर समाज और राष्ट्र का हित होना चाहिए। उन्होंने कहा कि यही सोच किसी भी जनआंदोलन की सबसे बड़ी शक्ति होती है।
कार्यक्रम में अपनी पुस्तक पर प्रकाश डालते हुए वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक अजय सेतिया ने दावा किया कि आपातकाल लागू करने से संबंधित आदेश का मसौदा राष्ट्रपति भवन के बजाय तत्कालीन प्रधानमंत्री आवास पर तैयार किया गया था। उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति को भेजे गए पत्र पर तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के हस्ताक्षर नहीं थे और बाद में तत्कालीन एपीएस आर.के. धवन वह पत्र राष्ट्रपति के पास लेकर गए, जिस पर राष्ट्रपति ने हस्ताक्षर किए। सेतिया ने इसे भारतीय लोकतंत्र के इतिहास की “सबसे असंवैधानिक घटना” बताया। उन्होंने कहा कि उनकी पुस्तक आपातकाल के दौर से जुड़े कई ऐसे तथ्यों और प्रसंगों को सामने लाती है, जिन पर अब तक अपेक्षाकृत कम चर्चा हुई है।
‘प्रभात प्रकाशन’ की ओरे से प्रकाशित इस पुस्तक के लोकार्पण समारोह में पद्म भूषण से सम्मानित वरिष्ठ पत्रकार, आपातकाल के दौरान मीसा बंदी रहे तथा वर्तमान में आईजीएनसीए के अध्यक्ष राम बहादुर राय ने भी अपने अनुभव साझा किए। उन्होंने आपातकाल के दौर की परिस्थितियों और उससे मिले सबकों पर विस्तार से प्रकाश डाला।

