Delhi

नैनीताल की सुरक्षा के प्रति गंभीर नहीं है सरकार।

कहावत है कि ‘घर में बारात आने के बाद पानी के लिए कुआं खोदना।’ यानी अदूरदर्शी और तदर्थवादी सोच। घर में बारात आने के बाद पानी के लिए कुआँ खोदने का उपक्रम होगा तो इस स्थिति में अफरा- तफरी होना स्वाभाविक है। हमारी सरकारें और सरकारी मशीनरी घर में बारात आने के बाद ही कुआं खोदने की अभ्यस्त होती चली जा रही है। सरकार संभावित समस्याओं से बचने के लिए अग्रिम सुरक्षा उपायों को अमल में लाने के बजाय समस्या के मुंह बाए खड़े हो जाने के बाद ही समस्याओं से निपटने के उपाय खोजने की आदी हो गई है। संबंधित सरकारी विभागों को भी ऐसी आपाधापी रास आने लगी है।

पिछले पखवाड़े नैनीताल की निचली मालरोड में हुए भू-धंसाव के बाद पूरी सरकारी मशीनरी यकायक चौकन्नी हो गई। उच्च अधिकारियों के स्थलीय भ्रमण और निरीक्षण का सिलसिला प्रारंभ हो गया, लेकिन नैनीताल की अति संवेदनशील पहाड़ियों में हो रही भू-गर्भीय प्रक्रियाओं को जानने-समझने के लिए ब्रिटिश शासनकाल में निर्मित ऑब्जर्वेटरी और ऑब्जर्वेशन पिलरों की सुध लेने की किसी ने भी आवश्यकता नहीं समझी। आज से करीब एक सौ बयासी साल पहले करीब आधा दर्जन प्रकृति प्रेमी अंग्रेजों ने भारत में नैनीताल नाम के एक नए हिल स्टेशन को बसाना प्रारंभ किया। उन्हें नैनीताल की भौगोलिक बनावट, सुंदरता और आबोहवा अपने वतन जैसी लगी। उन्होंने अपने ऐशगाह के रूप में नैनीताल को बसाया। अंग्रेजों ने वह सब व्यवस्थाएं सुनिश्चित कीं, जिससे यहां की आबोहवा, खूबसूरती और सुरक्षा बनी रहे।

ब्रिटिश हुक्मरानों ने नैनीताल में अधिसंरचनात्मक सुविधाओं के विस्तार के साथ-साथ वैज्ञानिक पद्धतियों से संरक्षणात्मक उपाय भी किए। 1947 में देश साम्राज्यवादी जकड़न से स्वतंत्र हुआ। अंग्रेज अपने वतन लौट गए। अंग्रेज यहां की पहाड़ियों के नाजुक मिजाज से वाकिफ थे। उन्होंने नैनीताल की कमजोर पहाड़ियों को भू-स्खलन से सुरक्षित रखने के लिए एक विस्तृत एवं नायाब नाला तंत्र विकसित किया। भूकंप और भारी वर्षा के कारण भू-धंसाव, पहाड़ियों में बदलावों, हलचलों, दरारों और पत्थर गिरने आदि प्राकृतिक गतिविधियों पर निगरानी रखने के लिए ऑब्जर्वेशन पिलर और ऑब्ज़र्वेटरियां बनाई। आज इन ऑब्जर्वेशन पिलरों और ऑब्ज़र्वेटरियों का कोई पुरसहाल नहीं है। इन ऑब्जर्वेशन पिलरों और ऑब्ज़र्वेटरियों को पुनर्स्थापित करने की जरूरत नहीं समझी जा रही है। ब्रिटिश काल में बने ऑब्जर्वेशन पिलरों और ऑब्ज़र्वेटरियों को आधुनिक तकनीक के साथ पुनर्स्थापित करने का प्रस्ताव पिछले कई वर्षों से उत्तराखंड शासन में धूल चाट रहा है।

15 जुलाई,1892 को नॉर्थ वेस्टर्न प्रोविंसेस एंड अवध की सरकार द्वारा जारी शासनादेश संख्या-सी.1835 (बी.आर.) के तहत नैनीताल की पहाड़ियों में संभावित भू-गर्भिक हलचलों पर नजर रखने के लिए ऑब्जर्वेशन पिलर बनाने के आदेश दिए गए थे। इस आदेश के बाद नैनीताल नगर में प्रत्येक एक हजार फीट की दूरी में 84 से अधिक ऑब्जर्वेशन पिलर बनाए गए थे। दो नाप के पिलरों का निर्माण किया गया था। कुछ ऑब्जर्वेशन पिलर दो फीट चौड़े और दो फीट ऊंचे बने थे। जबकि कुछ पिलर चार फीट चौड़े और चार फीट ऊंचे थे। इन सभी पिलरों को सफेद रंग से रंगा जाता था। इसके अलावा ब्लीक हाउस, चड़ता हिल, जसमंडविला और टांकी में ऑब्ज़र्वेटरियां बनाई गई थीं।

अंग्रेजों के समय प्रत्येक वर्ष एक जून से 15 अक्टूबर तक ऑब्जर्वेशन पिलरों की नियमित जांच की जाती थी। चूंकि भू-स्खलन के लिहाज से शेर-का- डांडा, नैना पीक, मनोरा क्षेत्र एवं कैलाखान की पहाड़ियां और राजभवन के पीछे के दक्षिणी ढलान को प्रारंभ से ही संवेदनशील माना जाता रहा है, इसलिए ब्लीक हाउस और चड़ता हिल पहाड़ी में अवस्थित पिलरों की प्रतिदिन जांच की जाती थी। बरसात के दिनों में शेर-का- डांडा , कैलाखान और डिपो रोड (नैनीताल-भवाली मोटर मार्ग) का प्रतिदिन मुआयना करना अनिवार्य था। एक पखवाड़े में एक बार सभी पिलरों की जांच किया जाना अनिवार्य था। साढ़े तीन इंच से अधिक वर्षा होने पर सभी ऑब्जर्वेशन पिलरों का अविलंब मुआयना और जांच की जाती थी।पिलरों में आई दरारों की हर सप्ताह जांच होती थी, इसका बाकायदा चार्ट बनता था। सप्ताह में एक बार सहायक अभियंता और महीने में एक बार अधिशासी अभियंता द्वारा ऑब्जर्वेशन पिलरों की जाँच किया जाना आवश्यक था। बरसात खत्म होने के बाद सभी ऑब्जर्वेशन पिलरों की दरारों का अध्ययन कर उनकी मरम्मत कर दी जाती थी। इस व्यवस्था से सरकारी अमला पहाड़ में हो रही भू-गर्भीय हलचलों से बा-खबर रहता था। संभावित खतरों के मद्देनजर यथासमय सुरक्षा इंतजाम कर लिए जाते थे। कुछ दशक पूर्व तक यही व्यवस्था लागू रही। समय के साथ सब बदल गया।

साल 2018 में पीडब्ल्यूडी को इन ऑब्जर्वेशन पिलरों और ऑब्ज़र्वेटरियों की याद आई। पीडब्ल्यूडी ने इनको पुनर्स्थापित करने का निर्णय लिया। भौगोलिक परिस्थितियों में आए हालिया बदलावों के मद्देनजर पीडब्ल्यूडी ने चार ऑब्जर्वेटरी और एक सौ ऑब्जर्वेशन पिलर बनाने की आवश्यकता बताई। इसके लिए 21.74 लाख रुपये का स्टीमेट बनाया। पीडब्ल्यूडी ने अंग्रेजी शासन काल की तर्ज पर ऑब्जर्वेशन पिलरों की निगरानी के लिए एक सहायक अभियंता, दो अपर सहायक अभियंता, दो सर्वेक्षक और छह अनुरक्षकों की तैनाती की आवश्यकता बताई। 26 फरवरी, 2018 को हिल साइड सेफ्टी कमेटी ने इस प्रस्ताव पर सहमति जता दी।

हिल साइड सेफ्टी कमेटी, अंग्रेजी शासनकाल में गठित एक उच्च स्तरीय विशेषज्ञ समिति है। ब्रिटिश सरकार ने 6 सितंबर,1927 को जारी आदेश संख्या 163-सी द्वारा हिल साइड सेफ्टी कमेटी का गठन किया था। कुमाऊं के कमिश्नर इसके पदेन अध्यक्ष होते हैं। कभीनैनीताल की पहाड़ियों, झील समेत संपूर्ण नगर की सुरक्षा व्यवस्था का दायित्व इसी विशेषज्ञ समिति का होता था। वर्तमान में यह कमेटी भी अपनी अहमियत खो चुकी है। पीडब्ल्यूडी से मिली जानकारी के अनुसार हिल साइड सेफ्टी कमेटी की सहमति मिलने के बाद पीडब्ल्यूडी के चीफ इंजीनियर ने 21जून, 2018 को नैनीताल नगर की पहाड़ियों में एक सौ ऑब्जर्वेशन पिलर और चार ऑब्ज़र्वेटरी बनाने के इस प्रस्ताव को वित्तीय और प्रशासनिक मंजूरी के लिए उत्तराखंड शासन को भेज दिया था। पीडब्ल्यूडी के सूत्रों के अनुसार उत्तराखंड सरकार से अब तक इस प्रस्ताव को स्वीकृति नहीं मिल पाई है। विगत आठ वर्षों से यह मामला शासन के स्तर पर अटका हुआ है।

पिछले वर्षों में उत्तराखंड के कई स्थानों में आई प्राकृतिक आपदाओं के बाद यहां के सभी नगरों की भार वहन क्षमता की जांच कराने की बात चली, लेकिन नैनीताल जैसे जिन नगरों की सुरक्षा के लिए पूर्व में की गई व्यवस्थाओं को दुरुस्त अथवा पुनर्स्थापित करने की दिशा में घोर लापरवाही बरती जा रही है। जानकार लोगों का मानना है कि नैनीताल नगर की भू-गर्भीय हलचलों की सतत जांच-परख एवं तदानुसार बचाव और सुरक्षात्मक उपाय अमल में लाने के लिए ऑब्जर्वेशन पिलरों एवं ऑब्ज़र्वेटरी का रखरखाव और पुनर्स्थापना आवश्यक है। यक्ष प्रश्न यह है कि इसे करेगा कौन?

(लेखक, वरिष्ठ पत्रकार हैं।)