Rajasthan

उच्च न्यायालय ने सिविल-मामलों में एफआईआर दर्ज करने को माना गलत, डीजीपी नए निर्देश करे जारी

जयपुर, 20 अप्रैल । राजस्थान उच्च न्यायालय ने आपसी लेनदेन, जमीन जायदाद विवाद, वाणिज्यिक विवाद सहित अन्य सिविल मामलों में एफआईआर दर्ज करने को गलत माना हैं। कोर्ट ने डीजीपी के सर्कुलर की पालना नहीं होने पर नाराजगी जताते हुए डीजीपी को निर्देश दिए है कि वह इस प्रकार के उल्लंखन की पुनरावृति रोकने के लिए नए सिरे से निर्देश जारी करें। जस्टिस प्रमिल कुमार माथुर की बैंच ने यह निर्देश धर्मेन्द्र ठक्कर व अन्य आरोपिताें की अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार करते हुए दिए। अदालत ने कहा कि डीजीपी इस मामले में सर्कुलर की पालना नहीं होने के कारणों का पता लगाए और जिस अधिकारी द्वारा लापरवाही की गई है, उसकी पहचान करें।

उच्चन्यायालय ने कहा कि सिविल नेचर के केस में एफआईआर तब तक दर्ज नही की जा सकती है, जब तक उसमें आपराधिक मामला नहीं बनता हैं। वहीं विरोधाभास की स्थिति उत्पन्न होने पर संबंधित पुलिस अधीक्षक से अनुमति लेना आवश्यक हैं। ऐसे में हम डीजीपी को निर्देश देते है कि वह अपने सर्कुलर की पूरे प्रदेश में कड़ाई से पालना करवाए और इस प्रकार के उल्लंघनों की पुनरावृत्ति को रोकने के लिए नए निर्देश और जरूरी उपाय करने पर भी विचार करें।

दरअसल, इस मामले में टोंक जिले के निवाई थाना पुलिस ने दो पक्षों में कॉर्मिशियल विवाद को लेकर एफआईआऱ दर्ज की थी। एक पक्ष ने आरोप लगाया था कि उसने दूसरे पक्ष को माल बेचा था। जिसके पेटे दूसरे पक्ष ने 18 लाख रुपये से ज्यादा का भुगतान नहीं किया। आरोपित पक्ष की ओर से कहा गया कि यह पूरी तरह से सिविल नेचर का मामला हैं, लेकिन पुलिस इसे आपराधिक रंग देते हुए गिरफ्तारी का दवाब बना रही हैं। जबकि सुप्रीम कोर्ट के अलग-अलग आदेशों और डीजीपी के 10 जून 2025 के सर्कुलर में साफ निर्देशित है कि सिविल नेचर के मामलों में पुलिस एफआईआर दर्ज नहीं करेगी। वहीं आरोपिताें की गिरफ्तारी से पहले संबंधित पुलिस अधीक्षक से लिखित में अनुमति लेनी होगी, लेकिन इस मामले में निर्देशों की पालना नहीं की गई हैं।