भारत के लिए प्रकृति संसाधन नहीं, एक जीवंत सत्ता है : कृष्ण गोपाल
नई दिल्ली, 11 मई । राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह डॉ. कृष्ण गोपाल ने सोमवार को कहा कि भारत के लिए प्रकृति केवल एक संसाधन नहीं बल्कि एक जीवंत सत्ता है।
डॉ. कृष्ण गोपाल कॉन्स्टीट्यूशन क्लब के मावलंकर सभागार में ‘प्रकृति विकास मंच’ के तत्वावधान में आयोजित ‘प्रकृति संवाद’ कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे। इस कार्यक्रम में पर्यावरण संरक्षण और भविष्य की विकास नीतियों पर गहन चर्चा की गई।
कार्यक्रम में केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी, दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. योगेश सिंह, लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. मुरलीमनोहर पाठक, पूर्व सांसद महेश चंद्र शर्मा, महाराजा अग्रसेन विश्वविद्यालय के कुलाधिपति डॉ. नंद किशोर गर्ग सहित सामाजिक कार्यकर्ता, विभिन्न क्षेत्रों के प्रबुद्धजन, पर्यावरण प्रेमी और गणमान्य जन मौजूद रहे।
डॉ. कृष्ण गोपाल ने कहा, “धरती हमारी संपत्ति नहीं, हमारी मां है। इसका संरक्षण ही मानवता का भविष्य सुरक्षित कर सकता है। पश्चिमी देशों के लिए धरती एक ‘संपत्ति’ हो सकती है लेकिन भारतीयों के लिए यह ‘माता’ है। हम धरती पर फावड़ा चलाने से पहले भी उससे अनुमति मांगते हैं।”
डॉ कृष्ण गोपाल ने देश के बदलते राजनीतिक परिदृश्य से लेकर केदारनाथ की दुर्गम पहाड़ियों और पूर्वोत्तर के चाय बागानों तक का उदाहरण देते हुए यह स्पष्ट किया कि भारत की आत्मा उसकी ‘प्रकृति-पूजा’ में बसती है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि हमने धरती को गर्म करना जारी रखा तो इसके दुष्परिणाम भीषण होंगे। बेमौसम बरसात और प्राकृतिक आपदाएं इसी शोषण का नतीजा हैं।
डॉ. कृष्ण गोपाल ने प्रकृति विकास मंच के संयोजक केएन गोविंदाचार्य के प्रयासों की सराहना करते हुए समाज से ‘मितव्ययी’ और ‘संयमी’ बनने का आह्वान किया। उन्होंने संदेश दिया कि यदि हम सच में प्रकृति का संरक्षण करना चाहते हैं तो हमें अपनी जीवनशैली को ऋषियों की उस परंपरा के अनुरूप ढालना होगा, जहां जितनी आवश्यकता है उतना ही लेने का अनुशासन हो।
इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (आईजीएनसीए) के अध्यक्ष रामबहादुर राय ने कहा कि पंडित दीनदयाल उपाध्याय के बाद यदि कोई सच्चा राजनीतिक दार्शनिक है, तो वे केवल केएन गोविंदाचार्य हैं। मैं नहीं जानता कि उनके राजनीतिक दर्शन से सत्ता चलेगी या नहीं लेकिन यह निश्चित है कि इससे समाज में सुधार आएगा और वह स्वावलंबी बनेगा।
केएन गोविंदाचार्य ने कहा कि किसी भी राष्ट्र की उन्नति केवल कर या राजस्व से नहीं बल्कि वहां की ‘सोशल कैपिटल’ और ‘कल्चरल ट्रेडिशनल’ (सांस्कृतिक परंपराओं) से तय होती है। उन्होंने युवाओं से अपना रास्ता खुद बनाने का आग्रह किया।
कार्यक्रम में वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि आधुनिक विकास की दौड़ में प्रकृति की अनदेखी आने वाली पीढ़ियों के लिए संकट पैदा कर सकती है। विकास केवल बुनियादी ढांचे तक सीमित नहीं होना चाहिए बल्कि इसमें जल, जंगल और जमीन का संरक्षण अनिवार्य रूप से शामिल होना चाहिए।
————

