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बेल याचिका में 10 दिन की देरी पर हाईकोर्ट सख्त, यूपी सरकार पर 50 हजार का लगाया जुर्माना

प्रयागराज, 15 जुलाई । इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक जमानत याचिका के निस्तारण में पुलिस अधिकारियों की लापरवाही के कारण हुई 10 दिन से अधिक की देरी पर बुधवार को उत्तर प्रदेश सरकार पर 50,000 रुपये का जुर्माना लगाया है। अदालत ने निर्देश दिया कि यह राशि याचिकाकर्ताओं को अदा की जाए। साथ ही राज्य सरकार को जांच के बाद संबंधित पुलिस अधिकारियों से यह राशि वसूलने की स्वतंत्रता भी दी है।

जस्टिस अरुण कुमार सिंह देशवाल की पीठ दहेज मृत्यु के एक मामले में आरोपी सास-ससुर की जमानत याचिका पर सुनवाई कर रही थी। अदालत ने पाया कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई पर्याप्त साक्ष्य नहीं है जिससे यह साबित हो कि मृतका को दहेज की मांग पूरी न होने पर प्रताड़ित किया गया था। स्वतंत्र गवाहों के बयान भी पति-पत्नी के बीच सामान्य घरेलू विवाद की ओर इशारा करते थे। इन परिस्थितियों में अदालत ने दोनों आरोपियों को जमानत दे दी। अर्जी यासीन व अन्य की ओर से दाखिल किया गया था। मामला थाना – चांदपुर, बिजनौर का है।

हालांकि, आदेश पारित करते समय हाईकोर्ट ने पुलिस अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर गंभीर नाराजगी जताई। अदालत ने कहा कि संयुक्त निदेशक (अभियोजन) कार्यालय द्वारा 17 जून को जमानत याचिका की प्रति पुलिस पैरवीकार को उपलब्ध करा दी गई थी। इसके बाद 19 जून को पुलिस अधीक्षक को अलर्ट भेजा गया और 29 जून को रिमाइंडर भी दिया गया, लेकिन इसके बावजूद पुलिस ने अदालत को आवश्यक निर्देश और केस डायरी उपलब्ध नहीं कराई। अदालत ने यह भी पाया कि 3 जुलाई को केस डायरी का पीडीएफ सीसीटीएनएस पोर्टल से मंगाने के निर्देश के बावजूद पुलिस ने केवल आरोपियों का आपराधिक इतिहास भेजा, केस डायरी नहीं। इसके बाद संबंधित एसएचओ, उपनिरीक्षक और सर्किल अधिकारी को व्यक्तिगत रूप से अदालत में उपस्थित होना पड़ा।

सुनवाई के दौरान एसएचओ ने छुट्टी और कांवड़ यात्रा की ड्यूटी का हवाला दिया, जबकि उपनिरीक्षक ने ‘कम्युनिकेशन गैप’ का कारण बताया। वहीं, सर्किल अधिकारी ने कहा कि उनके साथ तैनात हेड कांस्टेबल ने हाईकोर्ट से आए संदेशों की जानकारी ही नहीं दी। अदालत ने अधिकारियों द्वारा एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डालने के रवैये पर आश्चर्य जताया। हाईकोर्ट ने कहा कि यदि समय पर आवश्यक निर्देश उपलब्ध करा दिए जाते, तो जमानत याचिका का निस्तारण 3 जुलाई को ही हो सकता था। लेकिन पुलिस की लापरवाही के कारण मामला 10 दिनों से अधिक लंबित रहा।

इन्हीं परिस्थितियों में अदालत ने उत्तर प्रदेश सरकार पर 50,000 रुपये की लागत ( जुर्माना ) लगाते हुए निर्देश दिया कि यह राशि याचिकाकर्ताओं को दी जाए। साथ ही बिजनौर के पुलिस अधीक्षक को संबंधित अधिकारियों की जांच कर उनके खिलाफ उचित कार्रवाई करने और आवश्यकता पड़ने पर यह राशि उनसे वसूलने का निर्देश भी दिया। अदालत ने अपने आदेश की प्रति उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक और बिजनौर के पुलिस अधीक्षक को भी भेजने का निर्देश दिया है।