अदालती आदेश आदेशों की पालना नहीं हुई तो डीओआईटी और वित्त सचिव को तलब कर पूछेंगे सवाल-हाईकोर्ट
जयपुर, 11 अगस्त । राजस्थान हाईकोर्ट ने प्रदेश की सरकारी स्कूलों के जर्जर भवन और उनमें मूलभूत सुविधाएं नहीं होने से जुडे मामले में राज्य सरकार के रवैये पर नाराजगी जताई है। अदालत ने कहा कि अफसरों को बदलने या निलंबित करने से कुछ नहीं बदलेगा। जो व्यक्ति इनके भले का काम करने के लिए प्रेरित नहीं है, वह काम नहीं करेगा। इसके साथ ही अदालत ने राज्य सरकार को चेतावनी देते हुए कहा कि यदि अदालती आदेश की पालना नहीं हुई तो डीओआईटी सचिव व वित्त सचिव को बुलाकर उनसे सवाल किए जाएंगे। अदालत ने कहा कि इन अफसरों से सीधे ही फंड आवंटन, मॉनिटरिंग और क्वालिटी कंट्रोल के बारे में बात करनी चाहिए। जस्टिस महेन्द्र गोयल व जस्टिस अशोक कुमार जैन की खंडपीठ ने यह टिप्पणी जर्जर भवनों में चल रहे स्कूलों के स्वप्रेरित प्रसंज्ञान मामले सहित अन्य जनहित याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए दिए।
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से कहा महाधिवक्ता ने कहा कि यदि आगामी सुनवाई पर राज्य सरकार के जवाब से अदालत संतुष्ठ नहीं हो तो अफसरों को कोर्ट अफसरों को बुला सकती है। इसके सााि ही राज्य सरकार ने अदालती निर्देशों की पालना के लिए समय मांगा। खंडपीठ ने राज्य सरकार को समय देते हुए कहा कि आगामी 10 सितंबर तक एसीएस एजुकेशन अपना शपथ पत्र और उच्च शिक्षा, तकनीकी और चिकित्सा शिक्षा विभागों से ज़रूरी डेटा अदालत में पेश करें। अदालत ने कहा कि राज्य सरकार से जिस मुद्दे पर शपथ पत्र मांगा जाता है, सरकार उसके जवाब के बजाय कुछ और ही पेश कर देती है। अदालत ने एजी से कहा कि स्कूल भवनों को लेकर रिपोर्ट दाखिल की है, जिसमें जर्जर स्कूलों की संख्या बताई है। इनमें 1150 में से करीब 900 स्कूलों में क्लासरूम जर्जर हालत में हैं। क्या यह स्थिति सही है। इस पर महाधिवक्ता ने कहा कि अदालत के निर्देश पर कमेटियां बनाई हैं और कुछ अन्य कमेटी बननी है। जिस पर अदालत ने मंशा जताते हुए कहा कि आपको एक कमेटी बनानी चाहिए और किसी ऐसे व्यक्ति को नियुक्त करना चाहिए जो यह काम कर सके। जिससे कि संसाधनों का बेहतर से बेहतर इस्तेमाल हो सके। फंड की योजना बनाए और यह भी बताए कि उनका इस्तेमाल किस तरह किया जाएगा और अगले 5 सालों में उनका उपयोग कैसे होगा। हमें भविष्य के लिए भी तैयारी करनी होगी, लेकिन अभी तो हम मौजूदा समस्याओं का ही समाधान नहीं कर पा रहे हैं। स्कूलों के लिए फंड इकट्ठा करने के संबंध में अदालत ने कहा कि छोटे गांवों में भी दानदाता होते हैं, लेकिन यदि वे अपना पैसा लगाते हैं, तो वे पारदर्शिता और जवाबदेही चाहते हैं कि फंड का इस्तेमाल उसी मकसद के लिए हो जिसके लिए उसे मंज़ूरी दी गई है।
सुनवाई के दौरान अदालत ने महाधिवक्ता से पूछा कि आनंदी पोद्दार स्कूल मामले में आपका क्या कहना है। इस पर एजी ने कहा कि वहां मुख्य समस्या हॉस्टल मेस के खाने और टॉयलेट को लेकर थी। इस पर कार्रवाई की जा चुकी है और प्रिंसिपल को सस्पेंड कर दिया गया है। जिस पर अदालत ने कहा कि प्रिंसिपल को बदलने या सस्पेंड करने से कुछ नहीं बदलेगा, लड़कियों के लिए भी बुनियादी सुविधाएं नहीं हैं।

