Himachal Pradesh

कांगड़ा के बड़े संस्थानों को बर्बादी की ओर धकेल रही सुक्खू सरकार : त्रिलोक कपूर

धर्मशाला, 19 सितंबर । भाजपा नेता कपूर ने कहा कि हिमाचल प्रदेश की वर्तमान सुक्खू सरकार की नीतियों, प्रशासनिक विफलताओं और लगातार अनदेखी के कारण जिला कांगड़ा के प्रमुख और ऐतिहासिक संस्थानों का अस्तित्व संकट में पड़ गया है।

उन्होंने कहा कि केवल कागजों और सरकारी बयानों में कांगड़ा को पर्यटन राजधानी घोषित कर देने से जमीनी विकास नहीं होता। जिस जिले के संस्थानों ने दशकों तक पूरे प्रदेश को स्वास्थ्य, शिक्षा, कृषि और अनुसंधान के क्षेत्र में नेतृत्व दिया है, आज उन्हीं संस्थानों को कांग्रेस सरकार की उपेक्षा और कुप्रबंधन का खामियाजा भुगतना पड़ रहा है। यह केवल संस्थानों की बदहाली नहीं, बल्कि कांगड़ा के भविष्य के साथ खिलवाड़ का प्रश्न है।

शनिवार को धर्मशाला में पत्रकार वार्ता को संबोधित करते हुए प्रदेश वरिष्ठ प्रवक्ता ने कहा कि प्रदेश के प्रमुख चिकित्सा संस्थान टांडा मेडिकल कॉलेज में स्थिति अत्यंत दयनीय बनी हुई है। यहां इलाज के लिए आने वाले मरीजों को बुनियादी दवाइयां, सुई, आवश्यक इंजेक्शन और पैरासिटामोल जैसी साधारण दवाएं तक उपलब्ध नहीं हो पा रही हैं। हिमकेयर और आयुष्मान भारत जैसी स्वास्थ्य योजनाओं के तहत मिलने वाली सेवाएं बाधित होने के कारण गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों को इलाज का आर्थिक बोझ स्वयं उठाना पड़ रहा है।

उन्होंने कहा कि उत्तरी भारत के प्रसिद्ध आयुर्वेदिक कॉलेज पपरोला की स्थिति भी चिंताजनक है। संस्थान में शिक्षकों के अनेक पद खाली पड़े हैं और स्थायी नियुक्तियों के बजाय प्रतिनियुक्ति के सहारे व्यवस्था खींचने का प्रयास किया जा रहा है। इसका सीधा परिणाम यह है कि स्नातक की सीटें 75 से घटाकर 65 और स्नातकोत्तर की सीटों में भी कटौती की गई है।

भाजपा नेता ने कहा कि सबसे गंभीर और चिंताजनक स्थिति पालमपुर कृषि विश्वविद्यालय की है। पिछले तीन वर्षों से विश्वविद्यालय में स्थायी कुलपति की नियुक्ति नहीं हो पाई है। सरकार को किसी भी प्रकार के राजनीतिक हस्तक्षेप से दूर रहते हुए शीघ्र प्रक्रिया के माध्यम से स्थायी कुलपति की नियुक्ति करनी चाहिए।

त्रिलोक कपूर ने कहा कि कृषि विश्वविद्यालय में विद्यार्थियों की फीस में बेतहाशा बढ़ोतरी की गई, जिसके विरोध में छात्रों को मजबूर होकर आंदोलन और हड़ताल का रास्ता अपनाना पड़ा। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय के कर्मचारियों और पेंशनभोगियों की स्थिति भी किसी से छिपी नहीं है। उन्हें हर महीने की 10 तारीख तक वेतन और पेंशन के लिए इंतजार करना पड़ रहा है।

कपूर ने कहा कि विश्वविद्यालय में आउटसोर्स पर कार्यरत तकनीकी कर्मियों के साथ भी गंभीर अन्याय किया जा रहा है। संस्थान का प्रशासनिक और शैक्षणिक ढांचा भी लगातार सिकुड़ रहा है। विश्वविद्यालय में पहले कुल कर्मचारियों की स्वीकृत संख्या लगभग 2000 थी, जिसे घटाकर 1100 किया गया और वर्तमान में केवल लगभग 600 पद ही भरे हुए हैं। शिक्षकों और वैज्ञानिकों के लगभग 60 प्रतिशत पद रिक्त होने से पठन-पाठन और अनुसंधान कार्य बुरी तरह प्रभावित हो रहे हैं।

उन्होंने कहा कि केंद्रीय विश्वविद्यालय कांगड़ा के विकास में भी लगातार रुकावटें पैदा की जा रही हैं। जदरांगल परिसर के निर्माण हेतु आवश्यक लगभग 30 करोड़ रुपये की राशि जारी न करना और देहरा परिसर में बिजली तथा पानी से संबंधित मूलभूत देनदारियों का समय पर भुगतान न करना यह सवाल खड़ा करता है कि आखिर कांगड़ा में स्थापित होने वाले इन राष्ट्रीय स्तर के संस्थानों को राज्य सरकार अपेक्षित सहयोग क्यों नहीं दे रही है।