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धर्मांतरण विरोधी एफआईआर में स्कूली छात्राओं को राहत देने से इनकार, याचिका खारिज

प्रयागराज, 17 अप्रैल । इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कक्षा 12 की दो छात्राओं के खिलाफ दर्ज एफआईआर रद्द करने से इनकार कर दिया। इन छात्राओं पर यूपी धर्मांतरण विरोधी कानून के तहत आरोप लगाया गया कि उन्होंने अपनी सहपाठी को बुर्का पहनने के लिए मजबूर किया और उसे इस्लाम में धर्मांतरित करने की कोशिश की।

अपने आदेश में जस्टिस जेजे मुनीर और जस्टिस तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने युवाओं द्वारा दूसरों पर अपना धर्म-मान्यता ’थोपने’ के ’परेशान करने वाले चलन’ पर भी संज्ञान लिया। कोर्ट ने कहा यह एक ऐसी प्रवृत्ति है, जिसे यूपी गैर-कानूनी धर्मांतरण निषेध अधिनियम, 2021 के माध्यम से रोकने का प्रयास किया गया।

अदालत ने टिप्पणी की, “यदि युवाओं के बीच इस तरह का चलन देखने को मिलता है तो यह और भी अधिक परेशान करने वाला है। यह उनके जीवन का वह समय है, जब उन्हें शिक्षा के विभिन्न क्षेत्रों में अपने कौशल को विकसित करने के बारे में अधिक सोचना चाहिए और खुद को समाज और राष्ट्र की सेवा में समर्पित करना चाहिए।“ अदालत ने आगे कहा कि जांच के दौरान एकत्र की गई सामग्री से प्रथम दृष्टया (पहली नज़र में) एक ऐसा मामला सामने आता है, जिसकी गहन जांच की आवश्यकता है। अदालत ने कहा कि 2021 का कानून एक उभरती हुई बुराई को रोकने के लिए बनाया गया, और ठोस सबूतों के आधार पर शुरू की गई कानूनी कार्रवाई को शुरुआती चरण में ही खत्म करके इस कानून को कमज़ोर नहीं किया जा सकता।

मामले के अनुसार पीड़िता के भाई ने एक एफआईआर थाना बिलारी, मुरादाबाद में दर्ज कराई थी। पीड़िता मुरादाबाद में कक्षा 12 की छात्रा है। आरोप लगाया गया कि उसकी 5 मुस्लिम सहपाठियां जिनमें याचिकाकर्ता (अलीना और शबिया, दोनों बालिग) भी शामिल थीं-उसे एक स्थानीय ट्यूशन सेंटर में बुर्का पहनने और इस्लाम अपनाने के लिए मजबूर कर रही थीं। बीएनएसएस की धारा 180 और 183 के तहत दर्ज अपने बयानों में पीड़िता ने दिसम्बर 2025 की एक विशेष घटना का ज़िक्र किया। इस घटना में उन 5 लड़कियों ने एक बुर्का लाकर उसे पहना दिया था।

पीड़िता ने आगे आरोप लगाया कि ये सहपाठियां मांसाहारी भोजन लाती थीं और जब वह मांस खाने से इनकार करती थी, तो वे उसे तरी (ग्रेवी) खाने का लालच देती थीं। उसने यह भी आरोप लगाया कि उनमें से एक (अलीना) ने तो उसका इस हद तक ब्रेनवॉश कर दिया था कि उसकी सोचने-समझने की शक्ति ही खत्म हो गई। यह आरोप भी लगाया गया कि वे बार-बार उससे कहते थे कि उनका धर्म अच्छा है कि कुरान को चालीस दिनों में पढ़ा जा सकता है और बुर्का पहनने से कहीं भी आने-जाने की आज़ादी मिलती है।

आरोपित-याचिकाकर्ता (शबिया) के वकील ने दलील दी कि विवादित एफआईआर में याचिकाकर्ता के खिलाफ धर्म-परिवर्तन के सामान्य और अस्पष्ट आरोप लगाए गए। यह भी कहा गया कि यह एफ आई आर, अलीना द्वारा शिकायतकर्ता के खिलाफ की गई शिकायत का जवाबी कदम है। शिकायतकर्ता अलीना का पीछा कर रहा था और उसे परेशान कर रहा था। इसके अलावा, यह भी बताया गया कि याचिकाकर्ता 18 साल की लड़की है, जिसे अपनी 12वीं कक्षा की परीक्षाएं देनी हैं। फिलहाल इस केस की वजह से हो रहे भटकाव के कारण वह अपनी पढ़ाई पर ध्यान नहीं दे पा रही है।

बेंच ने शुरू में ही यह नोट किया कि केस डायरी में पीड़िता एक गली में लगे सीसीटीवी कैमरे में कैद हुई, जिसमें उसे याचिकाकर्ता और अन्य सह-आरोपितों द्वारा ज़बरदस्ती बुर्का पहनाते हुए देखा गया। कोर्ट ने यह भी पाया कि केस डायरी में जांच के दौरान इकट्ठा की गई “काफी सामग्री“ मौजूद थी, जिससे पहली नज़र में ऐसा मामला बनता है जिसकी गहन जांच की ज़रूरत है।

कोर्ट ने आगे कहा कि क्या याचियों के कृत्य 2021 के कानून के तहत दंडनीय प्रलोभन या अनुचित प्रभाव की श्रेणी में आते हैं, यह एक ऐसा सवाल है जिसकी जांच एफआईआर रद्द करने की याचिका में करना अभी जल्दबाजी होगी। सभी परिस्थितियों को देखते हुए कोर्ट ने विवादित एफआईआर रद्द करने से इनकार कर दिया। आरोपित शाबिया के पक्ष में पारित अंतरिम आदेश को भी रद्द कर दिया गया।