मनुष्य अपना स्वयं ही मित्र है और स्वयं ही शत्रु
मनुष्य अपना स्वयं ही मित्र है और स्वयं ही शत्रु
गुना, 27 मई (हि.स.)। मनुष्य अपना स्वयं ही मित्र है और स्वयं ही शत्रु है। जिस मनुष्य ने इन्द्रियों और मन को अपने वश में कर रखा हो वह जीवात्मा आप ही मित्र है और जिस मनुष्य ने इन्द्रियों और मन को अपने वश में नहीं कर रखा वह जीवात्मा आप ही शत्रु है। उपरोक्त विचार ओमप्रकाश शर्मा ने रमेश चंद्र साहू के दुर्गा कालोनी स्थित स्वनिवास में गीता स्वाध्याय में व्यक्त किए। गीताजी का पूजन श्रीमती रामकिशोरी साहू और रमेश चंद्र साहू ने किया, गीता प्रेरणा गीत गणेश गौरी गुरु वंदना रामायण की चौपाइयों, गीता महात्म्य के श्र्लोक तथा अध्याय छै के प्रथम ग्यारह श्र्लोकों का वाचन पंडित अंकित पाण्डेय ने कराया।
सुभाषितमें में श्रीमती रेखा पाण्डेय ने बताया कि मनुष्य को दूसरों के प्रति सदैव अच्छा व्यवहार रखना चाहिए उसे ऐसा कोई काम नहीं करना चाहिए जिससे दूसरे के दिल को ठेस पहुंचे। अमृत वचन में केशव बैरागी ने बताया कि हमें सदैव दूसरे के हित के कार्य करना चाहिए,जिस प्रकार संत, सरिता, पर्वत, वृक्ष, और धरती सदैव दूसरों के हित का काम करते हैं उसी प्रकार मनुष्य को भी दूसरों के हित के कार्य करना चाहिए।
प्रेरक प्रसंग में रामस्वरूप सेन ने कहा कि शिष्य बनाने के पहले उसकी परीक्षा लेने के उपरांत ही शिष्य बनाना चाहिए। गीता भजन कर्तव्य मार्ग पर डट जाना गीता हमें सिखाती है पंडित अंकित पाण्डेय ने सुनाया।स्वाध्याय में श्रीमती रेखा पाण्डेय, हेमलता सक्सेना, किरण शर्मा, राखी भार्गव, प्रमिला, रामकिशोरी साहू, भोगीराम साहू, के एन शर्मा, रमेश चंद्र साहू, बुंदेलसिंह यादव, धर्मवीर सिंह, परमार सिंह रघुवंशी, रविन्द्र सिंह रघुवंशी, जशवंत सिंह रघुवंशी, रामजीवन भार्गव, बृजभूषण शर्मा,राजकमल शर्मा, वीरेंद्र भार्गव, शिवांश रघुवंशी, उमाशंकर भार्गव सहित नियमित स्वाध्यायी उपस्थित रहे एवं धर्मलाभ प्राप्त किया।
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