सबरीमाला मामला: सुप्रीम कोर्ट ने कहा- धार्मिक संस्थाओं के प्रबंधन में अराजकता नहीं, स्पष्ट व्यवस्था जरूरी
नई दिल्ली, 28 अप्रैल ।सबरीमाला मंदिर मामले पर सुनवाई के नौंवे दिन मंगलवार को उच्चतम न्यायालय ने कहा कि किसी धार्मिक संस्था के प्रबंधन के अधिकार का मतलब ये नहीं है कि उसके संचालन का कोई ढांचा न हो और प्रबंधन को लेकर अराजकता की स्थिति नहीं हो सकती है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली नौ सदस्यीय संविधान बेंच ने कहा कि ऐसी संस्थाओं के कामकाज की एक व्यवस्था होनी चाहिए।
सुनवाई के दौरान हजरत ख्वाजा निजामुद्दीन औलिया की दरगाह से जुड़ी चिश्ती निजामी परंपरा के वंशज पीरजादा सैयद अल्तमश निजामी की ओर से पेश वकील निजाम पाशा ने कहा कि दरगाह वो स्थान होता है जहां किसी संत को दफनाया गया हो। इस्लाम में मृत्यु के बाद संतों की स्थिति को लेकर अलग-अलग मत हैं, लेकिन सूफी आस्था प्रणाली में उस स्थान के प्रति गहरी श्रद्धा होती है, जहां किसी संत को दफनाया जाता है। पाशा ने कहा कि किसी धार्मिक संस्था में प्रवेश को विनियमित करने का अधिकार प्रबंधन का हिस्सा है। इस पर जस्टिस अमानुल्लाह ने कहा कि प्रबंधन के अधिकार का मतलब ढांचे का अभाव नहीं हो सकता है और हर चीज के लिए एक व्यवस्था होनी चाहिए, अराजकता नहीं हो सकती। चाहे दरगाह हो या मंदिर, संस्था से जुड़े तत्व होंगे और धार्मिक क्रियाओं का एक तरीका होगा और कार्यों के संपादन का क्रम होगा। जस्टिस अमानुल्लाह ने कहा कि किसी न किसी को इसे विनियमित करना होगा।
सुनवाई के दौरान संविधान बेंच ने वकील अश्विनी उपाध्याय को अप्रासंगिक और विषय से बाहर की दलीलें देने पर कड़ी फटकार लगाई। कोर्ट ने उन्हें कई बार टोकते हुए कहा कि वे अपनी दलीलें केवल प्रश्नगत मुद्दों तक सीमित रखें।
दरअसल, अश्विनी उपाध्याय ने धर्म को रिलीजन से बड़ा बताते हुए कहा कि धार्मिक मतभेदों के कारण भारत का विभाजन हुआ है। उन्होंने कहा कि कोर्ट को अपने फैसलों के दूरगामी प्रभावों पर विचार करना होगा और यह तय करेगा कि भारत भविष्य में किस दिशा में जाएगा। इस पर जस्टिस महादेवन ने टोकते हुए कहा कि आप विषय से भटक रहे हैं और आपको केवल प्रश्नगत मुद्दे पर ही अपनी दलीलें रखनी चाहिए। जस्टिस बीवी नागरत्ना ने भी उन्हें भाषा संबंधी बहस से बचने को कहा।
23 अप्रैल को सुनावई के दौरान कोर्ट ने हल्के-फुल्के अंदाज में कहा था कि वो व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी की जानकारी को स्वीकार नहीं कर सकती। वरिष्ठ वकील नीरज किशन कौल ने अपनी दलीलों में कांग्रेस नेता शशि थरुर के एक आलेख का जिक्र किया था जिसमें कहा गया था कि धार्मिक मामलों में न्यायिक हस्तक्षेप ठीक नहीं है। तब जस्टिस बीवी नागरत्ना ने कहा था कि व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी की सूचना को स्वीकार नहीं किया जा सकता है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली इस बेंच में जस्टिस बीवी नागरत्ना, जस्टिस एमएम सुंदरेश, जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, जस्टिस अरविंद कुमार, जस्टिस एजे मसीह, जस्टिस पीबी वराले, जस्टिस आर महादेवन और जस्टिस जॉयमाल्या बागची शामिल हैं।
उच्चतम न्यायालय ने 28 सितंबर 2018 को 4-1 के बहुमत से फैसला सुनाया था । कोर्ट ने कहा था कि महिलाओं के साथ काफी समय से भेदभाव होता रहा है। महिला पुरुष से कमतर नहीं है। एक तरफ हम महिलाओं को देवी स्वरुप मानते हैं दूसरी तरफ हम उनसे भेदभाव करते हैं। कोर्ट ने कहा था कि बायोलॉजिकल और फिजियोलॉजिकल वजहों से महिलाओं के धार्मिक विश्वास की स्वतंत्रता को खत्म नहीं किया जा सकता है।

