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बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर रिहाई का आदेश

प्रयागराज, 23 जून । इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने आपराधिक मामले में कानपुर के गिरफ्तार अर्जुन यादव को अंतरिम जमानत देते हुए उत्तर प्रदेश पुलिस से कार्रवाई को लेकर कड़े सवाल पूछे हैं। न्यायमूर्ति सिद्धार्थ और न्यायमूर्ति विवेक सरन की खंडपीठ ने अवैध निरूद्धि के खिलाफ दाखिल बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर यह आदेश दिया है।

अर्जुन यादव को किदवई नगर थाने में दर्ज एफआईआर के तहत गिरफ्तार किया गया था। आरोप है कि उन्होंने सह-अभियुक्त मनीष कुमार के खाते में रूपये 20,55,499 ट्रांसफर किए और एक संगठित गिरोह में शामिल रहे। हालांकि अर्जुन यादव का कहना है कि यह रकम हैदराबाद में विश्वविद्यालय खोलने के लिए दिया गया कर्ज था, जिसके एवज में मनीष कुमार ने रूपये 10 लाख का चेक सुरक्षा के रूप में दिया था।

याची अधिवक्ता का कहना था कि गिरफ्तारी मेमो में गिरफ्तारी का समय 18 मई 2026, दोपहर 1ः04 बजे दर्शाया गया है, जबकि सीसीटीवी फुटेज से साफ है कि अर्जुन यादव को 17 मई 2026 को शाम 3ः53 बजे ही हिरासत में ले लिया गया था, जब वे अपनी पत्नी और डेढ़ साल के बच्चे के साथ कहीं जा रहे थे। फुटेज यह भी दिखाता है कि उनकी कार 17 मई की रात 11ः47 बजे संजय वन पुलिस चौकी पर खड़ी थी।

अदालत ने पाया कि गिरफ्तारी मेमो में परिवार को सूचित किए जाने का कोई स्पष्ट उल्लेख नहीं है। मेमो में गंगा सागर यादव का नाम और मोबाइल नंबर तो दर्ज है, लेकिन उनके और बीना यादव के हस्ताक्षर लिए गए या नहीं, यह स्पष्ट नहीं किया गया। सरकारी जवाबी हलफनामे में भी इस बिंदु पर कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया गया। अदालत ने सरकार को तीन सप्ताह के भीतर स्पष्टीकरण सहित पूरक हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है।

कोर्ट ने अर्जुन यादव को रूपये 50,000 के व्यक्तिगत मुचलके और दो जमानतदार (समान राशि) कानपुर नगर के सी जे एम की संतुष्टि के अनुसार प्रस्तुत करने पर जेल से रिहा करने का आदेश दिया। अगली सुनवाई 27 जुलाई को होगी।